राजसिंह पैनोरमा, राजसमन्द

राजसिंह पैनोरमा, राजसमन्द

परियोजना का नाम : महाराणा राजसिंह पेनोरमा 

(बजट घोषणा 2016-17 पेरा संख्या 59.0.0)

वित्तीय स्वीकृति: 124.53 लाख रूपये

भौतिक प्रगति: पेनोरमा भवन की मरम्मत का कार्य प्रगति पर है।

महाराणा राजसिंह के जीवन का संक्षिप्त परिचय

नाम:- महाराणा राजसिंह।

पिता:- इनके पिता का नाम महाराणा जगतसिंह था।

माता:- इनकी माता महारानी जनादे कवर मेड़तणी थी।

जन्म दिनांक:- महाराणा राजसिंह का जन्म 24 सितम्बर, 1629 ई. को हुआ।

जन्म स्थान:- राजसमंद।

विवाह:- महाराणा राजसिंह के कुल अठारह विवाह हुए थे। पहला विवाह बूंदी के राजा शत्रुसाल की कन्या कुंवर बाई और दूसरा विवाह जैसलमेर के भाटी मनोहरदास की कन्या कृष्णा कुंवर से हुआ था। महाराणा राजसिंह को सर्वाधिक प्रसिद्धि इनके द्वारा किषनगढ़ के राजा रूपसिंह की कन्या चारुमति से विवाह करने पर मिली। 

निर्वाण:- महाराणा राजसिंह का देहावसान 22 अक्टूबर, 1680 को हुआ।

निर्वाण स्थल:- कुम्भलगढ़ के पास ओडा गांव।

वंषज:- महाराणा राजसिंह के नौ पुत्र एवं एक पुत्री थी। इनके पुत्रों के नाम सुलतानसिंह, सरदारसिंह, जयसिंह, भीमसिंह, गजसिंह, सूरतसिंह, इंद्रसिंह, बहादुरसिंह और तखतसिंह तथा पुत्री का नाम अजबकुंवरी था। महाराणा राजसिंह के देहावसान होने पर राजकुमार जयसिंह राजगद्दी पर आसीन हुआ।

चारित्रिक विषेषताएं:- महाराणा राजसिंह अत्यन्त निर्भीक, साहसी और पराक्रमी शासक थे। मेवाड़ राज्य में अनेक झील, तालाब और बावड़ियां बनवाकर उन्होंने अपने कुषल राज्य प्रबंधन और प्रजावत्सलता की छाप छोड़ी। किषनगढ़ की राजकुमारी चारुमति के स्वाभिमान की रक्षा करने हेतु उससे विवाह कर उन्होंने औरंगजेब को चुनौती दी। यह उनके अदम्य साहस और शूरवीरता को प्रकट करता है। वे मन्दिरों के रक्षक धर्मप्राण महाराजा के रूप में भी प्रसिद्ध है।   

सामाजिक/राजनीतिक योगदान:- महाराणा राजसिंह का राज्याभिषेक 22 अक्टूबर, 1652 ई. को हुआ। उन्होंने शासन संभालते ही अपने राज्य को सुदृढ़ करने के लिये चित्तौड़ किले की मरम्मत का कार्य प्रारंभ किया, जो कि बादषाह के साथ हुई संधि के कारण अब तक पूर्व महाराणाओं द्वारा नहीं किया जा रहा था। शाही सेना पर आक्रमण कर उन्होंने माण्डलगढ़, बनेड़ा, शाहपुरा, सावर, जहाजपुर और केकड़ी पर अधिकार कर लिया। इस विजय यात्रा ने उन्हे एक पराक्रमी महाराजा की पहचान दी। महाराणा राजसिंह अत्यन्त कुषल राज्य प्रबंधक और प्रजावत्सल शासक थे। उन्होंने मेवाड़ में अकाल के समय राजसमंद झील व जनादे सागर जैसे जलाषयों का निर्माण करवाया। यह जनादे सागर उदयपुर में बड़ी का तालाब के नाम से जाना जाता है। साथ ही अनेक बावड़ियों का निर्माण कर जल संकट का स्थाई समाधान किया। औरंगजेब के द्वारा वृन्दावन में मन्दिरांे के तोड़े जाने पर राजसिंह जी ने द्वारिकाधीष का मन्दिर कांकरोली के आसोटिया गांव में तथा श्रीनाथजी का मन्दिर सिंहाड़ गांव (श्रीनाथद्वारा) में निर्मित करवाकर इनकी रक्षा की। औरंगजेब के द्वारा जजियां कर लगाने पर महाराणा राजसिंह ने उसे पत्र लिखकर इसका विरोध किया। इतना ही नहीं अपितु औरंगजेब की कैद से निकल भागे दुर्गादास राठौड़ व कुंवर अजीतसिंह को शरण देकर उनकी रक्षा की। 

महाराणा राजसिंह की कुषल रणनीति व गुरिल्ला युद्ध प्रणाली के सामने औरंगजेब को न केवल घुटने टेकने पड़े अपितु वह जान बचाकर दक्षिण की ओर चला गया। 

अपने 28 साल के गौरवपूर्ण शासन व साहसिक कृत्यों को पूर्ण कर मात्र 52 वर्ष की अल्पायु में ही महाराणा राजसिंह का देहावसान हो गया। उनके बाद उनका ज्येष्ठ पुत्र जयसिंह मेवाड़ का महाराणा हुआ। 

जीवन की प्रमुख प्रेरणादायी घटनाएं:- किषनगढ़ के राजा रूपसिंह की पुत्री चारूमति अत्यन्त रूपवती थी। बादषाह औरंगजेब उससे विवाह करना चाहता था। अतः बादषाह ने किषनगढ़ के राजा को यह संदेष भिजवाया कि विवाह की तैयारी करो हम बारात लेकर आ रहे है। 

जब यह समाचार चारूमति को मिला तो वह बहुत दुःखी हुई। उसने मुगल बादषाह से विवाह न करने का निष्चय किया। उसने महाराणा राजसिंह को पत्र लिखा कि मैंने आपको अपने पति के रूप  में वरण कर लिया है। आप बादषाह औरंगजेब की कुदृष्टि से मेरी रक्षा करे। चारुमति का पत्र लेकर संदेष वाहक उदयपुर पहुंचा तो महाराणा राजसिंह ने पत्र पढ़कर सभी सामन्तों से विचार विमर्ष किया एवं सभी की राय से चैत्रपूर्णिमा 1659 ई. में किषनगढ़ जाकर चारूमति से विवाह करना सुनिष्चित किया गया। यह औरंगजेब को सीधी चुनौती देने का निर्णय था। साहसी महाराणा ने राजकुमारी पर आये संकट को स्वीकारा और बारात लेकर किषनगढ़ की ओर प्रस्थान किया। साथ ही साथ 50,000 सैनिकों की एक सेना को सलूम्बर के रावत रतनसिंह के नेतृत्व में औरंगजेब की ‘बाराती सेना’ रोकने के लिए प्रस्थान करने का आदेष दिया। महाराणा राजसिंह ने किषनगढ़ पहुंचकर वहां के राजा मानसिंह को कैद कर लिया और चारुमति से विवाह कर उदयपुर लौट आये।