संत रैदास पैनोरमा, चित्तोडगढ

संत रैदास पैनोरमा, चित्तोडगढ

परियोजना का नाम : संत  रैदास पेनोरमा

(बजट घोषणा 2016-17 पेरा संख्या 59.0.0)

वित्तीय स्वीकृति: 148.84 लाख रूपये

भौतिक प्रगति : पेनोरमा निर्माण का कार्य प्रगति पर है।

संत रैदास के जीवन का संक्षिप्त परिचय

नाम:- सुप्रसिद्ध संत रैदास रविदास, रूईदास, रोहीदास-इन नामों से ही जाने जाते है।

पिता:- संत रैदास के पिता का नाम रग्घु था। 

माता:- संत रैदास की माता का नाम कर्मा (धुरतिनिया) था। 

जन्म काल:- संत रैदास का जन्म माघ पूर्णिमा वि.सं. 1433 (सन् 1398 ई.) को हुआ।

जन्म स्थान:- संत रैदास का जन्म काषी के निकटवर्ती गांव मण्डूर (महुआडीह) में हुआ।

पत्नी:- संत रैदास की पत्नी का नाम लोना था। लोना सरल स्वभाव की महिला थी। 

चारित्रिक विषेषताएं:- संत रैदास उच्चकोटि के भक्त थे। उन्होंने रामानंद जी से दीक्षा लेकर समाज में पिछड़े और अस्पृष्य समझे जाने वाले लोगों को भक्ति का मार्ग दिखाया। संत रैदास ने अपने आचरण और व्यवहार से यह प्रमाणित कर दिया कि मनुष्य की महानता उसके जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर नहीं अपितु उसके विचारों की श्रेष्ठता और आचरण की पवित्रता जैसे गुणों के आधार पर तय होती है। मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा जैसे बाहरी कर्मकाण्डों की अपेक्षा संत रैदास सच्ची श्रद्धा और समर्पण को अधिक महत्व देते थे। 

जीवन की प्रमुख चमत्कारिक घटनाएं:- एक दिन एक ब्राह्मण गंगा स्नान करने जा रहा था। रैदास जी ने कहा कि आप गंगा स्नान करने जा रहे हैं, यह एक सिक्का लो इसे मेरी तरफ से गंगा मैया को दे देना। ब्राह्मण जब गंगाजी पहुंचा और स्नान करके जैसे ही सिक्का गंगा में डालने लगा तो गंगा मैया ने जल में से अपना हाथ निकालकर वह सिक्का ब्राह्मण से ले लिया तथा उसके बदले ब्राह्मण को एक सोने का कंगन दे दिया। ब्राह्मण जब गंगा मैया का दिया कंगन लेकर लौट रहा था तो उसे विचार आया कि यदि यह कंगन राजा को दे दिया जाए तो राजा बहुत प्रसन्न होगा और उसने वह कंगन राजा को भेंट कर दिया। राजा ने बहुत-सी मुद्राएं देकर उसकी झोली भर दी। ब्राह्मण अपने घर चला गया। इधर राजा ने वह कंगन अपनी महारानी को दिया तो महारानी बहुत खुश हुई और राजा से बोली कि कंगन तो बहुत सुंदर है, मुझे दूसरे हाथ के लिये भी ऐसा ही कंगन चाहिये। राजा ने उस ब्राह्मण को खबर भिजवाई कि जैसा कंगन पहले भंेट किया गया था वैसा ही एक और कंगन राजा को तीन दिन में लाकर दो वरना राजा के दंड का पात्र बनना पड़ेगा। खबर सुनते ही ब्राह्मण के होश उड़ गए। वह पछताने लगा कि मैं व्यर्थ ही राजा के पास गया, दूसरा कंगन कहाँ से लाऊँ? इसी ऊहापोह में उसे बचने का कोई ओर रास्ता नही दिखा तो वह रैदास जी की कुटिया पर पहुंचा और उन्हें पूरा वृत्तांत बताया। रैदास जी बोले कि चिंता मत करो। यदि कंगन तुम भी रख लेते तो मैं नाराज नहीं होता, न ही मैं अब तुमसे नाराज हूँ, रही दूसरे कंगन की बात तो मैं गंगा मैया से प्रार्थना करता हूं। रैदास जी ने अपनी वह कठौती उठाई जिसमें वे चमड़ा गलाते थे। उसमें जल भरा हुआ था। उन्होंने उसी मे गंगा मैया का आह्वान कर अपनी कठौती से जल छिड़का। गंगा मैया वहीं प्रकट हुई और उन्होंने एक और कड़ा रैदास जी को दे दिया। ब्राह्मण खुश होकर राजा को वह कंगन भेंट करने चला गया। तभी से यह कहावत प्रचलित है कि ‘‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’’।

सामाजिक/साहित्यिक/आध्यात्मिक योगदान:- संत रैदास ने भक्ति भावमय ऐसे अनेक पदों की रचना की जो आज भी जन-जन के कण्ठों में बसे हुए है। रैदास ने अपनी काव्य-रचनाओं में सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया है, जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फारसी के शब्दों का भी मिश्रण है। रैदास को उपमा और रूपक अलंकार विषेष प्रिय रहे हैं। सीधे-सादे पदों में संत कवि ने हृदय के भाव बड़ी सफाई से प्रकट किए हैं। इनका आत्म निवेदन, दैन्य भाव और सहज भक्ति पाठक के हृदय को प्रभावित करते हैं। रैदास के चालीस पद सिक्खों के पवित्र धर्मग्रंथ ‘गुरुग्रंथ साहब’ में भी सम्मिलित हैं। भक्त षिरोमणि मीरांबाई ने अपने पदों में संत रैदास को अपना गुरु स्वीकार किया है। 

संत रैदास ने जात-पांत, ऊँच-नीच और सभी प्रकार के सामाजिक भेद-भावों का खण्डन कर सामाजिक समरसता का अमृत मंत्र दिया।