लोकदेवता पाबूजी पैनोरमा, कोलू, जोधपुर

लोकदेवता पाबूजी पैनोरमा, कोलू, जोधपुर

परियोजना का नाम: लोकदेवता पाबूजी पेनोरमा, कोळू 

(बजट घोषणा 2016-17 पेरा संख्या 59.0.0)

वित्तीय स्वीकृति:  156.57 लाख रूपये

भौतिक प्रगति : पेनोरमा निर्माण का कार्य प्रगति पर है।

लोकदेवता पाबूजी के जीवन का संक्षिप्त परिचय

नाम:- लोकदेवता पाबूजी।

पिता:- पाबूजी के पिता का नाम धांधल जी था। ये जोधपुर के राठौड़ों के मूल पुरुष राव सीहा के पौत्र और राव आसथान के पुत्र थे। 

माता:- लोकमान्यता है कि पाबूजी का जन्म एक अप्सरा की कोख से हुआ। अप्सरा के स्वर्गलोक गमन करने के बाद रानी कमलादे ने इनका पुत्रवत् लालन-पालन किया। 

जन्म दिनांक:- ’राठौड़ां में खांप धांधलां री ख्यात’ के अनुसार पाबूजी का जन्म भाद्रपद शुक्ला पंचमी वि.सं. 1276 (सन् 1219 ई.) को माना गया है। ’पाबू प्रकास’ के रचयिता महाकवि मोडजी आषिया के अनुसार पाबूजी का जन्म सम्वत् 1299 (सन् 1242 ई.) में हुआ। 

जन्म स्थान:- फलौदी के समीप कोळू गांव, जिला-जोधपुर।

विवाह:- पाबूजी का विवाह अमरकोट के राजा सूरजमल सोढा की पुत्री सुपियारदे से हुआ था।

निर्वाण:- विष्वेष्वरनाथ रेउ एवं मोड़जी आषिया के अनुसार पाबूजी वि.सं. 1323 (सन् 1266 ई.) में वीरगति को प्राप्त हुए। 

चारित्रिक विषेषताएं:- लोक देवता पाबूजी वीरता, गो-रक्षा, शरणागत- वत्सलता और नारी सम्मान जैसे महान् गुणों के कारण जन-जन की श्रद्धा एवं आस्था का केन्द्र है। पाबूजी मात्र वीर योद्धा ही नहीं वरन् अछूतोद्वारक भी थे। उन्होंने अस्पृष्य समझी जाने वाली थोरी जाति के सात भाइयों को न केवल शरण ही दी अपितु प्रधान सरदारों में स्थान देकर उठने-बैठने और खाने-पीने में अपने साथ रखा। लोकदेवता पाबूजी अपने वचन की पालना और गोरक्षा हेतु बलिदान हो गये। डिंगल के महान कवि मोडजी आषिया ने ‘पाबू प्रकास-महाकाव्य’ नामक ग्रन्थ में वीर पाबूजी के जीवन-चरित्र एवम् तात्कालीन सामाजिक एवं राजनीतिक घटनाओं का विस्तृत वर्णन किया है।

सामाजिक/ आध्यात्मिक योगदान:- लोकदेवता पाबूजी के शौर्यपूर्ण बलिदान की घटना ने लोकजीवन में साहस, गो-रक्षा और वचन प्रतिपालन जैसे महान् गुणों की प्रतिष्ठापना की। सोढ़ा राजकुमारी सुपियारदे से विवाह करने के लिये वे देवल देवी की घोड़ी काळवी मांगकर लेकर गये थे। देवल देवी ने उनसे वचन लिया था कि यह घोड़ी उनकी गायों की रक्षा करती है। अतः अगर मेरी गायों पर कोई संकट आये तो आप तत्काल इनकी रक्षा के लिये आयंेगे। जब सुपियारदे के साथ पाबूजी के फेरे पड़ रहे थे तभी देवल देवी की गायों को जिन्दराव खींची द्वारा हरण कर लेने के संकेत मिले। पाबूजी एक क्षण की भी देर किये बिना फेरे अधूरे छोड़कर काळवी को लेकर गायों को बचाने पहुंच गये। वहां उन्होंने जिन्दराव खींची से युद्ध कर गायों को छुड़ा लिया और देवल देवी को सौंपने चल दिये। तीन दिन की इन भूखी-प्यासी इन गायों को रास्ते में एक कुएं पर जब वे पानी पिला रहे थे तो इसी बीच जिन्दराव ने इन पर पुनः आक्रमण कर दिया। इस संघर्ष में पाबूजी अपने साथियों के साथ वीरगति को प्राप्त हुए। इस घटना के प्रभाव में पाबूजी लोकदेवता के रूप में पूजे जाने लगे। 

राजस्थान के लोक जीवन में ऊंटों के देवता के रूप में भी इनकी पूजा होती है। विष्वास किया जाता है कि इनकी मनौती करने पर ऊंटों की रुग्णता दूर हो जाती है। उनके स्वस्थ्य होने पर भोपे-भोपियों द्वारा ’पाबूजी की पड़’ गाई जाती है। लोकदेवता के रूप में पूज्य पाबूजी का मुख्य स्थान कोलू (फलौदी) में है। जहां प्रतिवर्ष इनकी स्मृति में मेला लगता है। इनका प्रतीकचिन्ह हाथ में भाला लिए अष्वारोही पाबूजी के रूप में प्रचलित है। भील जाति के लोग पाबूजी को इष्ट देवता के रूप में पूजते हैं। एक विषेष भील जाति जिसे ‘पड़वाले भील’ कहते हैं, वे एक कपड़े पर पाबूजी के कई कामों के चित्र बनाए रखते हैं। फिर उस चित्रमय लम्बे कपड़े को प्रदर्षित कर उसके आगे भील व भीलन रातभर पाबूजी का गुणगान गा-गाकर नाचते व फिरते हैं। जनता पाबूजी को इष्ट मानकर तन्मय होकर रात्री भर सुनते रहते हैं। वह चित्रमय कपड़ा ‘पाबूजी की पड़’ कहलाता है। यह लोक गाथा के रूप में राजस्थान में प्रसिद्ध है।

धांधल राठौड़ों के अलावा थोरी भी उनके प्रमुख अनुयायी हैं, जो ’पाबूजी की पड़’ गाने के अलावा सांरगी पर उनका यष भी गाते हैं। पाबूजी के सम्बन्ध मंे प्रचुर साहित्य की रचना की गई है, जिससे उनके परवाड़े चाव से गाए-सुने जाते हैं। 

जीवन की प्रमुख प्रेरणादायी/चमत्कारी घटनाएं:- लोक-देवता पाबूजी का जीवनवृत्त अलौकिक व चामत्कारिक घटनाओं से ओतप्रोत है। पाबूजी का जन्म अप्सरा से होने से लेकर गौरक्षा हेतु फेरों में गठजोड़ा काट कर युद्ध में वीरगति प्राप्त करने तक के सभी कार्य देवत्वपूर्ण हैं। लोकनायक पाबूजी के जीवन से सम्बन्धित प्रमुख अलौकिक एवं चामत्कारिक घटनाएं निम्नांकित है:-

अलौकिक शक्ति से समुद्र को पार करना व मरुप्रदेष में ऊंट का   लाना:-

लोकमान्यता है कि मरुप्रदेष में ऊंट को लाने वाले पहले वीर पुरुष पाबूजी ही थे। इससे पूर्व मरुप्रदेष में ऊंट नहीं थे। बूढ़ोजी की पुत्री केलमदे का विवाह गोगाजी के साथ हुआ था। पाबूजी ने दहेज में सांढ़ियां देने का वचन दिया था। वचन पूरा करने हेतु पाबूजी उसी समय काळवी पर सवार होकर देदे सूमरे के राजा के टोले में से सांढ़ियां लाने के लिए प्रस्थान कर गए। रास्ते में सात समुद्र पड़ते थे। पाबूजी अपनी अलौकिक शक्ति से सातों समुद्रों को पार कर देदे सूमरे के राजा के टोले में पहुंचे और वहां से सांढ़ियां लेकर आ गये। उन्होंने गोगाजी को सांढ़िया भेंट कर अपने वचन की पालना की।

पाबूजी का मेंढक बनना और गोगाजी का सर्प बन जाना:-

एक बार पाबूजी और गोगाजी आपस में मिले। वहां दोनों ने अपना-अपना शक्ति परीक्षण करना चाहा। गोगाजी ने कहा आप मुझे ढूंढ लें तो मैं आपको मेड़ी का राज्य दे दूंगा और अगर आप हार जायें तो आपकी भतीजी केलमदे का विवाह मेरे साथ करना होगा। दोनों ने अपना-अपना रूप बदल लिया। 

पाबूजी मेंढक बनकर पोखर में प्रवेष कर गए तो गोगाजी सर्प बनकर उन्हें पकड़ ले आये। अब गोगाजी सर्प बनकर बिल में प्रवेष कर गये तो पाबूजी मेंढक बने हुए बाहर बैठे रहे उन्हें पता नहीं चला कि गोगाजी किधर हैं? इस प्रकार वे शर्त हार गए और अपनी भतीजी केलमदे का विवाह गोगाजी के साथ करना तय किया।

गोगाजी को चमत्कार दिखाना और घोड़ों का पोखर में तैरना:-

पाबूजी और गोगाजी मेड़ी से बाहर घूमने के लिए चले गए। रास्ते में चलते-चलते जब धूप तेज हो गई तो एक वृक्ष के नीचे अपनी जाजम बिछाकर विश्राम करने के लिए ठहर गए और घोड़ों को लाने पाबूजी गए तो आगे देखते हैं कि दो बाघ खड़े हुए हैं और घोड़ों को चरा रहे हैं। पाबूजी ने समझ लिया कि यह गोगाजी का चमत्कार है। पाबूजी वापस लौट गए और गोगाजी को कह दिया कि घोड़े मिले ही नहीं। पाबूजी छाया में बैठ गए। अब गोगाजी घोड़ों को ढूंढने गए तो आगे देखते हैं कि घोड़े एक पोखर में तैर रहे हैं। गोगाजी समझ गए कि यह पाबूजी की करामात है। उन्होंने पाबूजी को आकर कह दिया कि मुझे घोड़े नहीं मिले। तब दोनों ही उठकर वापस गए और अपने-अपने घोड़े लेकर घर को प्रस्थान किया।

मगरमच्छ का पेट चीर कर हार निकल लेना:-

पाबूजी की भतीजी केलमदे अपने पीहर आयी हुई थी। वह अपनी सहेलियों के साथ सरोवर पर स्नान करने के लिए गयी। केलमदे के गले में एक सुन्दर हार था। उस हार को गले में से खोल कर तट पर रख दिया और स्नान करने लगी। अचानक एक मगरमच्छ आया और वह हार को निगल कर चला गया। केलमदे जब बाहर आयी और हार नहीं मिला तो वह रोने लगी। रोने की आवाज सुनकर पाबूजी दौड़े आये। केलमदे से रोने का कारण पूछा। उसने कहा कि मेरा हार मगरमच्छ ले गया। पाबूजी ने तत्काल सरोवर में से मगरमच्छ को पकड़ा और उसका पेट चीर कर हार निकालकर केलमदे को दे दिया। हार पाकर केलम बड़ी प्रसन्न हुई परन्तु फिर रोने लगी। इस पर पाबूजी ने पूछा कि अब क्यों रो रहीं ही? उसने कहा मगरमच्छ को मारने को पाप मुझे लगेगा। तब पाबूजी ने मगरमच्छ और केलमदे पर करुणा करते हुए उसके पेट को सूई धागे से सी कर पानी में छोड़ दिया। पाबूजी की कृपा से मगरमच्छ जिन्दा हो गया।

अमरकोट के सूखे हुए बाग का हरा-भरा हो जाना:-

पाबूजी लंका से सांढियां लेकर लाये तो आते वक्त रास्ते में अमरकोट पड़ा। अमरकोट के सोढ़ों का बाग एक ऋषि के शाप के कारण पहले से सूखा हुआ था। उस बगीचे में पाबूजी के प्रवेष करते ही चमत्कार घटित हुआ और वह बाग हरा-भरा हो उठा। फल-फूल खिल उठे और बाग में कोयलें कुहुकने लगीं। इस चमत्कार की चर्चा सर्वत्र फैल गई। यह चर्चा अमरकोट की राजकुमारी सुपियारदे तक भी पहुंची। 

गौरक्षा हेतु बलिदान:-

पाबूजी बरात लेकर अमरकोट के लिए रवाना हुए तो पीछे से जिन्दराव खीची देवल देवी की गायों को घेर कर ले गया। देवल देवी विलाप करती हुए बूढ़ो जी के पास गई किन्तु उसे उनकी कोई सहायता नहीं मिली। उधर अग्नि के समक्ष पाबूजी और सुपियारदे के फेरे पड़ रहे थे कि अचानक बाहर खड़ी काळवी हिनहिनाहट करने लगी। वह अपने बंधनों को तुड़ाने का प्रयास करने लगी। पाबूजी ने चंवरी में बैठे ही घोड़ी की पुकार सुन ली और उठ खड़े हुए। अभी तक तीन फेरे हुए थे और चैथा फेरा चल रहा था। पाबूजी ने सुपियारदे सोढी से हथलेवा छुड़ा कर गठजोड़ की गांठ तलवार से काट दी और पाबूजी तत्काल चांदा और ढेमा को साथ लेकर चल पड़े। कोलू पहंुचकर वह देवलदेवी से मिले और गायों को ले जाने का समाचार मिलते ही उन्होंने जिन्दराव का पीछा किया और उसे युद्ध में पराजित कर गायों को कब्जे से छुड़ा कर देवल देवी को सौंपने के लिए चल पडे़। 

जिंदराव द्वारा हरण की गई गायें तीन दिन की भूखी-प्यासी थी। पाबूजी उन गायों को पानी पिलाने कुए पर ले गए। इधर मौका देखकर जिन्दराव अपने मामा भाटी की फौज लेकर पुनः पाबूजी पर हमला करने चल पड़ा। पाबूजी व उनके साथी प्यास से व्याकुल गायों को कुए से पानी निकाल कर पिला रहे थे तभी जिन्दराव ने धावा बोल दिया और वहां दोनों सेनाओं में घमासन युद्ध हुआ। इस युद्ध में कई सैनिकों के साथ पाबूजी के आजीवन साथी चंदा व ढेमा भी काम आये। गायों की रक्षार्थ युद्ध करते हुए पाबूजी भी वीरगति को प्राप्त हुए।