निम्बार्काचार्य पैनोरमा, सलेमाबाद, अजमेर

निम्बार्काचार्य पैनोरमा, सलेमाबाद, अजमेर

परियोजना का नाम :

(बजट घोषणा 2017-18, 66.0.0)

वित्तीय स्वीकृति : 300.00  लाख 

भौतिक प्रगति : पेनोरमा निर्माण का कार्य प्रगति पर है।

निम्बार्क-दर्शन का परिचय 

‘दर्शन’ शब्द के लिए अंग्रेजी में व्यवहत ‘फिलोसॉॅफी’ शब्द का विकास यूनानी भाषा के ‘फिलॉसफस’ से हुआ है, जिसका अर्थ विद्या का प्रेम होता है। अतः दर्शन की परिभाषा करते हुए प्लेटो ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘रिपब्लिक’ में लिखा है-‘‘वह, जिसे प्रत्येक प्रकार के ज्ञान में रूचि है और जो सीखने के लिए जिज्ञासु है तथा कभी भी सन्तुष्ट नहीं होता, सही रूप में ‘दार्शनिक’ कहा जाता है। दर्शन की इस परिभाषा में उसे सब प्रकार के ज्ञान की जिज्ञासा और कभी न बुझने वाली ज्ञान की प्यास कहा गया है। दूसरे शब्दों में,‘दार्शनिक’ आजीवन सत्य की खोज में लगा रहता है, क्योंकि उसे सत्य से प्यार होता है। जबकि दार्शनिक की खोज सम्पूर्ण सत्य की खोज है। प्लेटो के शब्दों मेें वह ‘सत्य के किसी अंश का नहीं, बल्कि समग्र का प्रेमी है।

वंेकटराव एम.ए. का कहना है- ‘दर्शन एक विचारक अथवा दृष्टिकोण है, जिससे व्यवस्थित समग्र रूप में विश्व-दर्शन किया जाता है, जिसमें मानव, प्रकृति तथा ईश्वर अथवा अन्तिम वास्तविकता का समुचित स्थान रहता है।

दार्शन का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। समस्त ज्ञान-विज्ञान का उसमें समाहार हो जाता है। स्वामी करपात्री जी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘मार्क्सवाद और रामराज्य’ में लिखा है, ‘दृश्यते वस्तु यायात्म्यं जनेन इति दर्शनम्’। दूसरे शब्दों में प्रमाण द्वारा आत्मानात्मा का ज्ञान जिससे होता है, उसका नाम ‘दर्शन-शास्त्र है।’ इस प्रकार दार्शनिक समपूर्ण जीवन पर दृष्टि रखता है। जब ग्लाउकन ने सुकरात से यह पूछा कि ‘सच्चे दार्शनिक कौन हैं ?’ तो सुकरात ने उत्तर दिया, ‘वह, जो कि सत्य की झांकी के प्रेमी हैं। दार्शनिक का यह ज्ञान सार्वभौम होने के साथ-साथ शाश्वत भी होता है। इस सम्बन्ध में बृहदारण्यकोपनिषद् का वह प्रसंग उल्लेखनीय है, जब याज्ञवल्क्य की इच्छा सन्यास लेने की हुई और उन्होंने अपनी दोनों स्त्रियों को सम्पत्ति बांटने का प्रस्ताव किया तो कात्यायनी के मुख् से तो कुछ नहीं निकला, क्योंकि वह प्रेयः कामिनी थी, उस धन में ही उसका सारा सुख निहित था, किन्तु मैत्रेयी थी श्रेयः कामिनी। अतः उसने सम्पत्ति को अस्वीकार करते हुए अमरत्व प्रदान करने वाले शाश्वत ज्ञान की शिक्षा देने की इच्छा व्यक्त की, ‘जिससे मैं अमर नहीं हो सकती उसे लेकर मैं क्या करूँगी ? मुझे तो वही बात बताइए जिससे मैं अमर हो सकूँ।’’ 

इस प्रकार दार्शनिक दृष्टिकोण में आश्चर्य की भावना, सन्देह, समीक्षा, चिन्तन और उदारता एवं सत्य की जिज्ञासा निहित है। ज्ञान ड्यूबी के अनुसार ‘‘जब कभी दर्शन को गम्भीरतापूर्वक ग्रहण किया गया है तो वह सदैव अवधारित हुआ है कि यह प्राप्त किये जाने वाले उस ज्ञान का महत्वांकन करता है, जो कि जीवन के आचार को प्रभावित करता हैं।

वेदार्थ को समझने के लिए वेदांगो के बाद सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान उपांगों का है, जिन्हें प्रायः दर्शनशास्त्र के नाम सेे जाना जाता है। न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्वमीमांसा तथा उत्तर मीमांसा नाम से अभिहित इन 6 दर्शनों के प्रणेता क्रमशः गौतम, कणद, कपिल, पतंजलि, जैमिनि तथा बादरायण व्यास हैं। पूर्व मीमांसा को प्रायः मीमांसा तथा उत्तरमीमांसा को वेदान्त दर्शन, ब्रह्मसूत्र तथा शारीरिक सूत्र के नाम से भी जाना जाता है।

निम्बार्क-दर्शन के प्रवर्तक सुदर्शन चक्रावतार भगवन्निम्बार्काचार्य हैं। यदि विचार पूर्वक देखा जाय तो द्वैताद्वैत दर्शन प्रणाली अन्य सभी दर्शनों से अधिक व्यापक होने के कारण ब्रह्म, जीव, प्रकृति, माया, सृष्टि एवं प्रलय, चेतन तथा अचेतन तत्वों की संतोषपद्र व्याख्या प्रस्तुत करने में अधिक उपयुक्त है। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है कि ‘एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतो मुखम्’ एकत्वेन अभेद रूप से, पृथक्त्वेन भेद रूप से अनेक महर्षि विश्व रूप से मेरी उपासना करते हैं। ‘क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि’’ जीवन मेरे से अभिन्न है, शब्द से भिन्न भी है। यही भेदाभेद है। श्रीशंकराचार्य जी ने अभेद पक्ष को प्रमुख माना है और माध्वाचार्य ने भेद पक्ष को । श्रीनिम्बार्काचार्य को भेदाभेद सिद्धान्त दोनों की विचारधारा की अपूर्णता को पूरा करने वाला है। अतः समन्वयवादी दर्शन है। 

1. निम्बार्क-दर्शन: प्रमुख दार्शनिक-सिद्धान्त एवं उपासना तत्त्व सिद्धान्त

 

1. श्रीनिम्बार्क सिद्धान्त में तत्त्वत्रय (ब्रह्म, जीव और प्रकृति ये तीनों तत्त्व) अनादि और अनन्त माने गये हैं, ब्रह्म स्वतंत्र है, जीव और प्रकृति, सदा सर्वदा ब्रह्म के आधीन हैं, किसी भी अवस्था में स्वतंत्र नहीं।

2. बुद्ध (संसारी) बद्ध मुक्त (भगवद्भक्ति द्वारा मुक्ति प्राप्त) एवं नित्य मुक्त (जो कभी भी माया के बंधन में नहीं फंसे) जीवों के ये संक्षिप्त रूप से तीन भेद हैं।

3. समस्त चराचर जगत् ब्रह्म का अंश एवं-परा परात्मिका प्रकृति (शक्ति) होने के कारण सत्य है। इसलिए किसी भी प्राणी को दुःख पहुंचाना, या उसके साथ विद्वेष करना है। जड़ वस्तुओं का भी दुरुपयोग करना निषिद्ध है। शास्त्र की आज्ञानुसार अचेतन तत्त्व में भी समादरणीय भाव रखना आवश्यक है।

4. स्वाभाविक भेदाभेद (द्वैताद्वैत, भिन्नाभिन्न) सिद्धान्त का भी यही रहस्य है, अर्थात् जीव रूप से चराचरात्मक विश्व-ब्रह्म से भिन्न है, किन्तु उसका अंश एवं शक्ति होने के कारण स्वभावतः अपृथक् सिद्ध अभिन्न भी है। यही स्वाभाविक भेदाभेद है।

5. जब जगत् के किसी भी अंश को मिथ्या मानना भूल है, तब प्रकृति और उसके कार्य रूप बन्धनादि भी मिथ्या कैसे कहे जा सकते हैं। हां, सच्चे बन्धन की निवृत्ति होती है।

6. बन्धननिवृत्ति एवं भगवद्भावापत्ति रूप मुक्ति भगवत् कृपा से ही होती है।

7. श्रुति, स्मृति आदि शास्त्र और आचार्य वाक्यों के किसी भी अंश में अप्रामाण्य नहीं है। तात्पर्यानुसार इनके बलाबल की व्यवस्था गम्भीर और ऊहा-पोह पूर्वक आचार्यों ने की है। उस पर आरूढ़ रहना चाहिये।

8. जीव प्रतिबिम्ब नहीं, न प्राकृतिक जगत् मिथ्या ही है। अतएव सर्वथा ब्रह्म से भिन्न भी नहीं। श्रीनिम्बार्क के सिद्धान्तानुसार तत्त्वमस्यादि महावाक्यों का यही तात्पर्य है। केवल परिणामी होने के कारण मिथ्या और विनश्वर आदि शब्दों से जगत् का निर्देश किया गया है। अल्पज्ञ, अल्पशक्ति-जीव और परिणामीशील होने के कारण जड़ तत्त्व ये दोनों तत्त्व रस एक कूटस्थ ब्रह्म से सर्वथा अभिन्न भी नहीं हो सकते। अतएव, भेद और अभेद दोनों ही स्वाभाविक हैं।

9. श्रीनिम्बार्काचार्य के वास्तविक भेदाभेद सिद्धान्त के अनुसार-1. उपास्य (ईश्वर), 2. उपासक (जीव), 3. कृपाफल 4. भक्तिरस 5. विरोधी तत्त्व (प्रकृति और प्रकृति के कार्यादि) ये पांचों वस्तु जानने के योग्य हैं। इन सबके ज्ञाता को ही पूर्णब्रह्मविद् कहा जाता है।