गुरु गोविन्द सिंह पैनोरमा, नरेना, जयपुर

गुरु गोविन्द सिंह पैनोरमा, नरेना, जयपुर

परियोजना का नाम : गुरु गोविन्द सिंह पैनोरमा, नरेना, जयपुर

(बजट घोषणा 2017-18, 176.02.0)

वित्तीय स्वीकृति : 300.00 लाख 

भौतिक प्रगति : पेनोरमा निर्माण का कार्य प्रगति पर है।

गुरु गोबिन्द सिंह जी के जीवन का संक्षिप्त परिचय 

हमें इस बात का गर्व है कि जिस भारत-भूमि में हमारा जन्म हुआ है वहां ऋषि-मुनियों की प्राचीन परम्पराओं से लेकर अर्वाचीन युग-प्रबोधकों, सामाजिक चिन्तकों/विचारकों द्वारा समय-समय पर देषकाल एवं परिस्थितियों के अनुरूप जनमानस की सुप्त चेतना एवं स्वाभिमान जागरण के स्तुत्य प्रयास होते रहे हैं। यह बात अलग है कि तत्कालीन समाज व्यवस्था में तथाकथित राजनैतिक प्रभुत्व के कारण जन सामान्य में विरोध के स्वर मुखर नहीं होते थे परन्तु दमन की पराकाष्ठा से व्यथित मानस मेदिनी के मंथन से निकली कोई लहर जब इस तथाकथित प्रभुत्व से टकराने निकल पड़ती तब वह ज्वार का रूप लेकर तमाम प्रतिबंधित तटबन्धों को समूल नष्ट करना चाहती, जो पाषविक एवं दमनकारी थे। 

ऐसी ही एक लहर मुगलों के अत्याचारों से त्रस्त हो तत्कालीन पंजाब प्रान्त से निकली जो मुगल सल्तनत के ताबूत की फांस बन गई। उस तूफानी लहर का नाम-गुरु गोबिन्द सिंह था। जी हां, ये वो ही गुरु गोबिन्द सिंह जी हैं जिन्होंने ‘खालसा’ की स्थापना कर, भयाक्रान्त हिन्दू समाज को एक सूत्र में बांधकर संगठित करने का प्रयत्न किया और औरंगजेब से लोहा लेने योग्य बनाया। यह गुरु गोबिन्द सिंह जी का ही साहस था, वो कहते थे- ‘चिड़ियों से मैं बाज़ तुड़ाऊँ, सवा लाख से एक लड़ाऊँ, तभै गोबिन्द सिंह नाम कहाऊँ।’ कितना अदम्य साहस, कितना जीवट, कितना आत्मविष्वास ! तत्कालीन खण्डित हिन्दू समाज मुगलों से लड़ने को तो दूर कल्पना तक नहीं कर सकता था। ऐसे में गुरु गोबिन्द सिंह जी ने हिन्दू समाज के आद्य-महापुरुषों के स्मरण से, उनके पुरखों के गौरवमयी अतीत के स्मरण से समाज को जाग्रत किया। इस हेतु उन्होंने अपने चारों पुत्रों का बलिदान कर दिया ताकि समाज का सोया स्वाभिमान जाग सके, वो उठ खड़ा हो और अन्याय को समूल नष्ट कर सके।

राष्ट्र के प्रति उनके योगदान का स्मरण हिन्दू समाज में चेतना भरता रहे। गुरु गोबिन्द सिंह जी के 350वें प्रकाषोतस्व के पावन पर्व की समुचित व्यवस्था राज्य सरकार द्वारा की गई। वर्तमान भारतीय समाज गुरु गोबिन्द सिंह जी के त्याग, बलिदान व राष्ट्रभक्ति को जान सके, यही इस पुस्तक का मूल मन्तव्य है। आषा है कि उनके कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर वर्तमान भारत गर्व करेगा एवं उनके बताये मार्ग पर चल सकेगा।

श्री गुरु नानक देव जी ने जिस आदर्ष मनुष्य का संकल्प विष्व के सम्मुख रखा था, गुरु गोबिन्द सिंह जी उसी संकल्प की साकार मूर्ति थे। इस मातृलोक में 42 वर्ष की अल्पायु में उनकी शख्सीयत से जो गुण एवं उपकार दृष्टिगत होते हैं वे विलक्षण हैं। वो एक ही समय में महान् तपस्वी, भक्त, बेमिसाल दानी एवं महान् शूरवीर योद्धा भी थे। अनेक शास्त्रों के ज्ञाता, महान् कवि, दार्षनिक, संत-सिपाही, अमृत के दाते, सर्वंषदानी, साहिबे कमाल, परोपकारी, समाज-सुधारक, युग-प्रवर्तक, बादषाह दरवेष श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी महाराज के गुणों की महिमा विराट है। इस सन्दर्भ में प्रख्यात कवि अल्लायार खां योगी क्या खूब लिखते हैं-

‘‘इन्साफ करे जी में जमाना तो यकीं है।

कहि दे गुरु गोबिन्द का सानी ही नहीं है।’’

हरचंद मेरे हाथ में पुरजीर कलम है। सतिगुरु के लिखूं वसफ कहां ताबि रकम है? एक आंख से क्या, बुलबुला कुल बहिल को देखे। साहिल को मझधार को या लहर को देखे। 

यह हमारा सौभाग्य है कि हम मानवता के रक्षक श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी का 350वां पावन प्रकाषोत्सव राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पूरे विष्व में बड़े हर्षोल्लास एवं श्रद्धा भावना से मना रहे हैं। यह खुषी की बात है कि केन्द्र सरकार इस अवसर को उत्साह से मना रही है और इस हेतु विषेष फंड की घोषणा भी की है। विभिन्न राज्य सरकारें भी इसमें योगदान दे रही हैं। 

स्मूची मानवता में ईष्वर का दीदार करने वाले गुरु साहिब मानव-प्रेम को ही सच्ची भक्ति तथा उपासना मानते थे। उनकी लड़ाई किसी जाति, धर्म के विरुद्ध नहीं बल्कि कट्टरता, धर्मांधता व जबरन धर्मान्तरण के विरुद्ध थी इसी भाव को लक्षित करता उनका फरमान है-

‘‘हिन्दू तुरक कोऊ राफज़ी इमाम साफी,

मानस की जात सभैं एकै पहचानबो।’’

खालसा पंथ की सरजना समय की मांग और ईष्वर की मौज अर्थात् इच्छा थी। यह अमृत की ही शक्ति थी जिसकी बदौलत देष व धर्म के हित में बेमिसाल कुर्बानियां दी गई। देष में बेषक अनेक दानी हुए हैं, जिन्होंने तन-मन-धन देष धर्म हेतु कुर्बान किया है, लेकिन इतिहास गवाह है गुरु गोबिन्द सिंह जी जैसा कोई सर्वंषदानी नहीं हुआ।

धर्म हेतु महान् बलिदानी श्री गुरु तेब बहादुर जी की शहादत की अनोखी तस्वीर, वो चाहे खालसा सृजना का परिदृष्य, ‘‘चमकौर के अभिमन्यु’’ शीर्षक से बड़े साहिबजादों का मैदाने-जंग में अद्भुत वीरता से दुष्मनों के छक्के छुड़ाना एवं फिर शहीदी का अमरजाम पीने का चाव, छोटे साहिबजादों का देष-धर्म की नींवों को मजबूत करने का दृढ़ संकल्प एवं हंसते-हंसते मासूमों का हत्यारों द्वारा जिन्दा दीवार में चिन देने की रुह को कंपा देने वाला साका एवं बैरागी से बहादुर बने बाबा बंदा सिंह बहादुर द्वारा गुरु जी के आषीर्वाद से मुगल साम्राज्य की नींव हिला कर खालसा राज की स्थापना करना और अन्त मंे श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी का अखण्ड ज्योति में विलीन हो महाजोत का रूप हो जाना इन परिदृष्यों को साकार रूप देने में लेखक की साधना व श्रद्धा भावना पुस्तक के हर अक्षर में लक्षित होती है। अतः मैं लेखक को हृदय की गहराइयों से मुबारकबाद देता हूं एवं ईष्वर से प्रार्थना करता हूं कि हम सब गुरु साहिब के दर्षाए मार्ग पर चल कर अपने बेषकीमती जीवन को सफल बना सकें तथा राष्ट्र के रूप में स्थापित कर सकें।

देष के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब बलिदानियों की शहादत को कुछ लोग कमतर आंक रहे थे तब दिनकर जी ने अपने एक महाकाव्य में कहा था-

‘‘जो पुण्य अहिंसा जप रहे उन्हें जपने दो।

जैसे सदियां थक चुकी उन्हें भी थकने दो।

हम देख चुके सब पुण्य कमा कर।

सौभाग्य दान गौरव अभियान गंवाकर।

वो पीयें शीत तुम आत्मघात पीयो रे।

वो जपें राम तुम बनके राम जीयो रे।

ये नहीं शांति की गुफा, युद्ध है रण है।

आज तप नहीं केवल तलवार शरण है।

ललकार रहा भारत को स्वयं मरण है।

हम जीतेंगे यह समय हमारा प्रण है।।’’

आज तलवारों की तो नहीं लेकिन दृढ़ राष्ट्र निष्ठा के संकल्पों की आवष्यकता है। गुरु गोबिन्द सिंह जी का अदम्य साहस व बलिदान इस नाते हमें उर्जित व प्रेरित रख सके ऐसी भावना व कामना सहित।