नागरीदास जी पैनोरमा किशनगढ़, अजमेर

नागरीदास जी पैनोरमा किशनगढ़, अजमेर

परियोजना का नाम: नागरीदास पेनोरमा, किशनगढ़

(बजट घोषणा 2016-17 पेरा संख्या 59.0.0)

वित्तीय स्वीकृति: 130.00 लाख रूपये

भौतिक प्रगति : पेनोरमा निर्माण का कार्य प्रगति पर है।

संत नागरीदास के जीवन का संक्षिप्त परिचय

नाम:- संत नागरीदास का मूल नाम महाराजा सावंतसिंह था। इनके गुरु वृन्दावन देवाचार्यजी ने इन्हें नागरीदास नाम दिया। संत प्रवृत्ति के होने के कारण यह संत नागरीदास के नाम से विख्यात हुए। 

पिता:- संत नागरीदासजी रूपनगर-किषनगढ़ के महाराजा राजसिंह जी के तीसरे पुत्र थे। महाराजा राजसिंह जी परमवीर और धर्मपरायण और थे। 

माता:- भानगढ़ नरेष जसवंतसिंह जी की पुत्री चतुरकुंवरी जी नागरीदास जी की माता थी। चतुरकुंवरी जी वैष्णव संस्कारों से युक्त थी एवं इन्होंने श्री निम्बार्काचार्य पीठाधिपति श्री नारायणदेवाचार्य जी से दीक्षा ली थी। नागरीदास की किषोरावस्था मे ही चतुरकुंवरी जी स्वर्ग सिधार गईं। तदनन्तर ये विमाता बांकावती (ब्रजकुंवरी जी) के सान्निध्य में रहे। 

जन्म दिनांक:- नागरीदास जी का जन्म सन् 1699 ई. (पौष कृष्ण द्वादषी वि. सं. 1756) को हुआ। 

जन्म स्थान:- नागरीदास जी का जन्म रूपनगर-किषनगढ़ में हुआ।

विवाह:- नागरीदास जी का विवाह 21 वर्ष की आयु में भानगढ़ नरेष यषवन्त सिंह की पुत्री लालकुँवरी के साथ हुआ।

निर्वाण:- वृन्दावन में भगवत्भक्ति एवं काव्यरचना करते हुए भाद्रपद शुक्ला पंचमी, वि. सं. 1821 (सन् 1764 ई.) को नागरीदास जी ब्रह्मलीन हो गये। वृन्दावनस्थ ‘‘श्री नागरीदास जी का घेरा’’ नामक स्थान पर उनकी समाधि बनी है।

वंषज:- विवाह के तीन वर्ष उपरान्त वि. सं. 1780 (सन् 1723 ई.) में इनके प्रथम पुत्र हुआ जो शैषवावस्था में ही दिवंगत हो गया। दूसरे पुत्र सरदार सिंह का जन्म भाद्रपद शुक्ला द्वितीया, वि. सं. 1787 (सन् 1730  ई.) को हुआ। सरदार सिंह आगे चलकर नागरीदास जी के उत्तराधिकारी हुए। नागरीदास जी के दो पुत्रियाँ-किषोर कुँवरी एवं गोपाल कुँवरी थी। 

चारित्रिक विषेषताएं:- नागरीदास जी बचपन से ही अत्यन्त साहसी एवं वीर थे। उन्होंने शस्त्र संचालन में शीघ्र ही निपुणता हासिल कर ली। विक्रम संवत् 1805 में महाराजा राजसिंह की मृत्यु के पश्चात् नागरीदास जी राजसिंहासन पर अभिषिक्त हुए किन्तु राजदरबार की कलहपूर्ण स्थितियों से खिन्न होकर राजसी प्रवृत्तियों से विरक्त हो गये और वृन्दावन प्रवास करने लगे। यहां इन्होंने स्वयं को कृष्णभक्ति और काव्य रचना मे संलग्न कर दिया। ये कुषल चित्रकार भी थे एवं कलाकारों को प्रश्रय देते थे। 

सामाजिक/साहित्यिक/आध्यात्मिक योगदान:- नागरीदास जी उच्चकोटि के कवि, चित्रकार एवं संगीतज्ञ थे। इन्होंने अपने भक्ति काव्य में भगवान कृष्ण का श्रृंगारात्मक वर्णन किया है। नागरीदास जी ने ब्रज, राजस्थानी, पंजाबी, गुजराती, डिंगल इत्यादि अनेक भाषाओं में रचनाएं की है। उनके रचे हुए ग्रंथों की संख्या 75 बताई जाती है। इनमें से 69 ग्रंथ ’’नागर समुच्चय’’ में प्रकाषित हुए हैं। इनके प्रमुख गं्रथ निम्नांकित है:-

1. मनोरथमंजरी 2. निकंुज विलास

3. रसिक रत्नावलि 4. विहारचंद्रिका

5. कलि वैराग्य वल्लि 6. भक्तिसार

7. पारायण विधि प्रकाष 8. ब्रजसार

9. गोपी प्रेम प्रकाष 10. ब्रज वैकुण्ठ तुला

11. पद प्रबोधमाला 12. भक्तिमग दीपिका

13. रामचरित्र माला 14. फागविहार

15. जुगल भक्ति विनोद 16. वन विनोद

17. बाल विनोद 18. वन जन प्रसंस गं्रथ 

19. सुजनानन्द 20. तीरथानन्द-इत्यादि।

 

किशनगढ़ की सुप्रसिद्ध चित्र शैली ‘बनीठनी’ नागरीदास जी की देन है।

 

जीवन की प्रमुख प्रेरणादायी घटनाएं:- दस वर्ष की आयु में एक बिगड़ैल हाथी पर वार कर, तेरह वर्ष की आयु में बूंदी के हाड़ा जैतसिंह को मारकर, अठारह वर्ष की आयु में थूणी के अजेयगढ़ को जीतकर एवं सागरमाला के जंगल में एक नरभक्षी सिंह को मारकर इन्होंने अपनी जन्मजात वीरता और निडरता का परिचय दिया। सन् 1793 में जब मराठा सरदार मल्हार राव अपने स्वामी पेषवा बाजीराव के साथ तात्कालीन राजपूताने की सभी छोटी बड़ी रिसासतों से चैथ वसूल करता हुआ रूपनगर आया तो इन्होंने साहस कर चैथ देने से मना कर दिया।

नागरीदास के जीवन का उत्तरार्ध अधिकांषतः वृन्दावन में बीता। सन् 1756 ई. में अपने पुत्र सरदारसिंह का राज्याभिषेक करके नागरीदास स्थायी रूप से वृन्दावन वास करने लगे। उनका अधिकांष साहित्य यहां रहकर अथवा यहां की पृष्ठभूमि में लिखा गया है। 

रीतिमुक्त काव्य धारा के प्रमुख कवि घनानन्द नागरीदास के कवि मित्र माने जाते हैं। उनके अतिरिक्त किषनगढ़ राजदरबार के कवि वृन्द, हरिचरण दास, हीरालाल, मुन्षी कान्हीराम, कल्लाह पन्नालालजी, वैष्णव विजयचन्दजी, दाहिवां विजय रामजी आदि भी नागरीदासजी के निकट सम्पर्क में रहे। इनकी अनन्य सहयोगिनी ‘बनीठनी’ जीवन पर्यन्त इनके साथ रहीं। 

महाराजा राजसिंह, महारानी बांकावती और महाराजा नागरीदास जी तीनों ही की भगवद्भक्ति के प्रभाव से बाहर के अनेक कवि-कलाकार गण भी रूपनगर में आ बसे और भक्तिविषयक कविता और चित्रों में भण्डार भरने लगे। भक्ति-साहित्य के साथ चित्रकला का केन्द्र भी रूपनगर बन गया। यही से जो चित्र शैली प्रारम्भ हुई। उसी का नाम आगे जाकर किषनगढ़ शैली पड़ा।