महकवि माघ व गंणितज्ञ ब्रहम्गुप्त पैनोरमा भीनमाल, जालोर

महकवि माघ व गंणितज्ञ ब्रहम्गुप्त पैनोरमा भीनमाल, जालोर

परियोजना का नाम: महाकवि माघ व गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त पेनोरमा, भीनमाल 

(बजट घोषणा 2016-17 पेरा संख्या 59.0.0)

वित्तीय स्वीकृति: 189.00 लाख रूपये

भौतिक प्रगति: पेनोरमा का निर्माण कार्य प्रगति पर है

महाकवि माघ एवं गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त के जीवन का संक्षिप्त  परिचय

‘षिषुपालवधम्’ महाकाव्य के रचयिता महाकवि माघ का नाम संस्कृत के महाकवि के रूप में विख्यात है। माघ ने ‘षिषुपालवध’ महाकाव्य की समाप्ति पर अपने वंष का संक्षिप्त सा विवरण दिया है। उसके अनुसार ‘‘माघ के पितामह सुप्रभदेव राजा वर्मल या वर्मलात के प्रधानमन्त्री थे। उनके पुत्र दत्तक के पुत्र माघ हुए जिन्होंने सुकवि रूप में कीर्ति प्राप्त करने के लिए लक्ष्मीपति के चरितकीर्तन स्वरूप ‘षिषुपालवध’ की रचना की।’’ बाह्य प्रमाणों के आधार पर माघ का समय सातवीं शती का उत्तरार्ध निष्चित किया जाता है। 

राजस्थान के वसन्तगढ़ से एक षिलालेख उपलब्ध हुआ है। जिससे माघ के स्थितिकाल पर प्रामाणिक प्रकाष पड़ता है। यह षिलालेख किन्हीं राजा वर्मलात का है तथा इसका समय 625 ई.       (682 वि.सं.) है। विद्वज्जन इस राजा वर्मलात को माघ के पितामह के आश्रयदाता राजा से अभिन्न मानते हैं। इनके पितामह का समय 625 ई. होने पर पौत्र माघ का समय 675 ई. से 700 ई. के बीच मान लेना युक्ति-संगत ही है।

महाकवि माघ का जन्म पष्चिमी राजस्थान के भीनमाल नामक स्थान पर हुआ, जिसकी पुष्टि षिषुपालवध नामक काव्य की कतिपय प्राचीन पुष्पिकाओं से होती है। इन पुष्पिकाओं में भिन्नमाल (भीनमाल) का उल्लेख हैं- ‘‘इतिश्री-भिन्नमाल-वास्तव्य ‘दत्तक’ सूनोर्महावैय्याकरणास्य ‘‘माघस्य’’ कृतौ षिषुपालवधे महाकाव्ये।’’

कुछ ग्रन्थों में माघ के जन्मस्थान के रूप में ‘श्रीमालनगर’ का उल्लेख हुआ है। ईसा की नवम शताब्दी में सर्वतः समृद्ध ‘श्रीमालनगर’ ही आज ‘भीनमाल’ नाम से विद्यमान है। जो वर्तमान मे राजस्थान के जालोर जिले में है। राजस्थान के गुजरात सीमा के निकटवर्ती ग्राम श्रीमालनगर (भीनमाल) के प्रषासक ‘वर्मलात’ के मन्त्री का नाम सुप्रभदेव था, जिनके पुत्र थे-दत्तक, सर्वाश्रय तथा शुभकर। श्री दत्तक के पुत्र का नाम कवीष्वर माघ था। 

माघकवि का जन्म माघ पूर्णिमा को हुआ। कवि का नामकरण भी माघ नाम से किया गया। किम्वदन्ती के अनुसार-जब माघ की जन्मकुण्डली बनाई गई तब ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि यह बालक प्रकाण्ड विद्वान् होने के साथ ही अन्त में महादारिद्र्य से पीड़ित होगा। अतः मा = लक्ष्मी और घ का अर्थ है ताड़न; अर्थात् जो लक्ष्मी से प्रताड़ित होगा, वही माघ नाम से समुच्चरित हुआ। ज्योतिषियों की भविष्यवाणी के अनुसार दानी, कवि माघ को अपने जीवन के अन्तिम क्षणों में दारिद्र्य से प्रताड़ित होना पड़ा।  

श्री बल्लाल कवि ने ‘भोजप्रबन्ध’ में लिखा है कि एक दिन जब राजा भोज सिंहासन पर राजसभा में बैठे थे, तब ही द्वारपाल ने उपस्थित होकर सप्रणाम निवेदन किया कि राजन्! गुर्जर देष (गुजरात) से दुर्भिक्ष (अकाल) से प्रपीड़ित आये हुए पण्डितवर माघ नगर से बाहर ठहरे हुये हैं। उन्होंने अपनी पत्नी को आपकी सेवा में भेजा है, वह द्वार पर उपस्थित है। राजा की आज्ञा से प्रविष्ट होकर माघ की पत्नी ने एक पत्र राजा भोज को दिया। राजा ने उसे पढ़ा। उसमें षिषुपालवध महाकाव्य के ग्यारहवें सर्ग का 64 वां पद्य लिखा था, जिसमें कविकृत प्रातःकाल का वर्णन था। राजा ने उस अद्भुत वर्णन को पढ़कर तीन लाख मुद्राएं देकर सम्मानित किया और कहा कि यह राषि भोजनार्थ दे रहा हूँ। प्रातःकाल में कवि के दर्षनार्थ आऊँगा। उसे लेकर चल पड़ी माघ की पत्नी ने अपने पति के यषोगान करने वाले याचकों में वह धन वितरित कर दिया। घर आकर उसने माघ पण्डित से कहा- ‘‘हे नाथ! राजा भोज ने मेरा बड़ा सम्मान किया और मुझे बहुत अधिक दान दिया, परन्तु जब मैं आ रही थी, तब याचकों के मुख से आपके लोकोत्तर गुणों को सुनकर मैंने वह सारा धन याचकों को दे दिया।’’ माघ ने कहा- ‘‘हे प्रिये! यह तो अच्छा किया, परन्तु अन्य याचक आ रहे हैं, उन्हें क्या देना चाहिए?’’ याचकों की भीड़ को देखकर तथा उनको देने के लिए कुछ भी न पाकर माघ निराष हो गये और उन्होंने दरिद्रता को कोसा। माघ की ऐसी अवस्था को देखकर सभी याचक अपने-अपने घर चले गये। याचकों के निराष लौट जाने पर माघ ने अपने प्राणों को भी निकल जाने को कहा- और माघ ने प्राण त्याग दिए।

 

दूसरे दिन राजा भोज 100 ब्राह्मणों के साथ पैदल ही चलकर वहां पहुंचे तो माघ की पत्नी ने कहा कि राजन्! महापण्डित आपके राज्य को प्राप्त हुए, अब आप इनका औध्र्वदैहिक कार्य विधिवत् सम्पन्न करा दें। राजा ने माघ कवि के पार्थिव शरीर को नर्मदा के तट पर पहुंचा दिया जहां माघ की पत्नी उसके साथ अग्नि में प्रविष्ट हो गई। राजा ने माघ की समस्त उत्तरक्रियाएं पुत्रवत् सम्पन्न की। राजा ने भी कालिदास व माघ सदृष विद्वानों के विरह में देह त्याग कर दिया।

चैदहवीं शताब्दी के जैन विद्वान् श्री मेरुतुग्ङाचार्य द्वारा रचित ‘प्रबन्ध चिन्तामणि’ नामक ग्रन्थ में महाकवि माघ की विद्वत्ता तथा पुण्यवत्ता का उल्लेख प्राप्त होता है, वहां उसमें माघ कवि का आवास नगर ‘श्रीमालनगर’ स्वीकार किया गया है। इस ग्रन्थ के अनुसार श्री भोज ने महाकवि माघ की विद्वत्ता, पाण्डित्य एवं पुण्यवत्ता के समाचार सुनकर उसके दर्षन की उत्सुकतावष शीत ऋतु में उन्हें श्रीमालनगर से अपने राज्य में ससम्मान बुलाकर सत्कार किया तथा अपने समीप रत्नजटित पलंग पर सुलाकर प्रेमपूर्वक विनोदवार्ता करते हुए रात बिताई। दूसरे दिन प्रातःकाल माघ पण्डित ने अपने नगर लौटने की इच्छा की। यद्यपि राजा भोज ने माघ पण्डित की सुख-सुविधा की दृष्टि से पर्याप्त व्यवस्था की थी, परन्तु माघ पण्डित उससे संतुष्ट नहीं थे। माघ पण्डित के स्वस्थान को लौटने के कुछ दिनों बाद राजा भोज ने कवि की वैभवपूर्ण सामग्री के वास्तविक स्वरूप को जानने की इच्छा से श्रीमालनगर प्रस्थान किया। माघ पण्डित ने उसका जो सम्मान किया, उससे वह चकित था। वह राजा को अपनी अष्वषाला में ले गया, जिसकी फर्ष मणिजटित थी। उसका महल सोने की फर्ष से बना था, उसका स्नानागार मणि-मरकत कुट्टिम मण्डित होने से जलभ्रान्ति युक्त था। भोजन में रसवती आदि विषिष्ट व्यंजनों के आस्वादन से वह आनन्दित था। शीतकाल में भी ग्रीष्म ऋतु का सा अनुभव माघ के वैभवाधिक्य का प्रदर्षन कर रहे थे। कुछ दिन वहां निवास कर राजा भोज मालव प्रान्त लौट गया। 

माघ के पिता ने किसी ज्योतिषी से यह जानकर कि माघ की मृत्यु श्वास विकृति से होगी, उसके लिए 36 हजार दिन तक के लिए पूर्ण उपभोग सामग्री जुटा कर रख दी थी। परन्तु माघ के पिता श्री दत्तक सर्वाश्रय के देहान्त के बाद माघ पण्डित ने अपनी असीम धनसम्पत्ति को याचकों में वितीर्ण कर स्वयं को महादानी कहलाने का गौरव प्राप्त किया। पुण्यक्षय होने से दरिद्री हुए माघ का अपने राज्य में रहना कठिन हो गया और वह मालवा चला गया और अपनी पत्नी को भोज के पास भेजकर कुछ द्रव्य प्राप्ति की कामना की। राजा भोज ने शलाका माध्यम से महाकाव्य की श्रेष्ठता की परीक्षा लेते हुए एकादष सर्गस्थ एक पद्य को पढ़ा तो वह उसके-वर्णन कौषल से प्रभावित हुआ। राज ने माघ की पत्नी को दो लाख स्वर्णमुद्राएं समर्पित कर विदा किया। मार्ग में माघ की दानषीलता का वर्णन करने वाले याचकों व प्रशंसकों को राजा भोज से प्राप्त धन सम्पत्ति का वितरण करती हुई माघ पत्नी अपने नगर खाली हाथ ही लौटी। सम्पूर्ण परिस्थिति को जानकर अपने घर से हताष लौटते हुए याचकों को देखकर अत्यधिक दुःखी हुए महाकवि माघ दिवंगत हो गए। 

माघकृत महाकाव्य षिषुपालवध:-

‘षिषुपालवध’ महाकाव्य में बीस सर्ग हैं जिनमें युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में श्रीकृष्ण के द्वारा उद्धत षिषुपाल के वध की घटना मुख्य है। इसकी कथावस्तु महाभारत के सभापर्व (अध्याय 33-45) से ग्रहण की गई है। श्रीमद्भागवत में यह कथा अत्यन्त सूक्ष्म रूप में प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त पùपुराण, विष्णु पुराण एवं ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी यह कथा संक्षेप में वर्णित है। शिषुपालवध महाकाव्य की कथा सर्गानुसार इस प्रकार है- 

प्रथम सर्ग- आकाषमार्ग से नारद जी पृथिवी पर श्रीकृष्ण के सम्मुख उतरते हैं। कृष्ण अध्र्यदान के पश्चात् नारद जी के आने का प्रयोजन पूछते हैं। नारद जी षिषुपाल के गर्व एवं अत्याचारों से पीड़ित संसार और इन्द्र के भय का वर्णन करके श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हैं कि वे षिषुपाल का वध करें। नारद जी षिषुपाल को पूर्वजन्म का रावण बताते हंै। श्रीकृष्ण षिषुपालवध का वचन देकर नारद जी को विदा करते हैं। 

द्वितीय सर्ग- सभागृह में बलराम, श्रीकृष्ण एवं उद्धव मन्त्रणा करने के लिए प्रविष्ट होते हैं। वहां युधिष्ठिर की ओेर से राजसूय यज्ञ में सम्मिलित होने का निमन्त्रण प्राप्त होता है। दो कार्यों में से प्रथम क्या करणीय है? इस वादविवाद को उद्धव अपने राजनीति कौषलपूर्ण वचनों से समाप्त कर देते हैं और राजसूय यज्ञ में ही षिषुपाल के अपमान और वध की युक्ति सोच कर सभी राजसूय यज्ञ में इन्द्रप्रस्थ जाने की तैयारी करते हैं। 

तृतीय सर्ग- श्रीकृष्ण के वैभव का वर्णन, नगरी वर्णन, सौंदर्य वर्णन, सामथ्र्य वर्णन, बलवर्णन आदि की चर्चा की गई हैं।

चतुर्थ सर्ग- रेवतक पर्वत का नैसर्गिक सौंदर्य वर्णन किया गया है। माघ ने इस सौंदर्य वर्णन में अप्रतिम प्रतिभा का परिचय दिया है। इस पर्वत का सौंदर्य चित्ताकर्षक है।

पंचम सर्ग- रेवतक के सौंदर्य पर मुग्ध श्रीकृष्ण का उसके लताकुंजों में रहकर क्रीड़ा कौतुक करने की इच्छा। सेना का निवास, रमणियों का रमण, यादव दम्पतियों की विलास क्रीड़ा और आनन्द का वर्णन किया गया है। 

षष्ठ सर्ग- छः ऋतुओं का आगमन उनकी शोभा एवं प्रभाव का वर्णन ऋतु सौंदर्य का वर्णन। इस प्रकार उस पर्वत पर कुछ दिन और रहने की श्रीकृष्ण की अभिलाषा और आनन्द के अनुभव का वर्णन किया गया है।

सप्तम सर्ग- यादव दम्पतियों का ऋतुओं में वन-विहार वर्णन। जल क्रीड़ा, पुष्पावचय तथा नानाप्रकार की क्रीड़ाओं का मनोहारी वर्णन है। 

अष्टम सर्ग- जलक्रीड़ा का महत्त्वपूर्ण विलास वर्णन, हाव-भाव चेष्टाओं का प्रभाव वर्णन और वहां से निकलकर सुंदर वेषभूषा धारण करने का वर्णन है।

नवम सर्ग- यादव परिवारों की वेषभूषा, सालंकारिता, सौंदर्य, आनंद और विविध प्रसाधनों का अच्छा वर्णन किया गया है। 

दषम सर्ग- यादवों का मधुपान, उनकी मस्ती और विलासिता एवं पूर्ण श्रृंगार का वर्णन पराकाष्ठा के रूप में है।

एकादष सर्ग- सूर्य-चंद्र का अस्तोदय वर्णन, सूर्याेदय पर श्रीकृष्ण को जगाने के लिए बंदी मागध लोगों का स्तुति गान और सुप्रभात का अच्छा वर्णन किया गया है। 

द्वादष एवं त्रयोदष सर्ग- प्रस्थान, मार्गवर्णन, युधिष्ठिर का श्रीकृष्ण के स्वागत के लिए आना-स्वागत करना, युधिष्ठिर का यष इत्यादि का वर्णन विषद रूप से किया गया है। 

चतुर्दष सर्ग- युधिष्ठिर अग्रपूजा करके श्रीकृष्ण के प्रति सम्मान प्रकट करते हैं। 

पंचर्दष सर्ग- अग्रपूजा से रुष्ट षिषुपाल कृष्ण, युधिष्ठिर एवं भीष्म को दुर्वचन सुनाता है।

षोड़ष सर्ग- षिषुपाल का दूत आकर द्व्यर्थक सन्देष सुनाता है कि या तो कृष्ण षिषुपाल की अधीनता मानें या मरने को तत्पर हों। 

सप्तदष सर्ग से विंषति सर्ग- श्रीकृष्ण और षिषुपाल के विद्वेष की चर्चा, पारस्परिक कलह का वर्णन, युद्ध की विविध विधियों का वर्णन, सेनाओं का पारस्परिक युद्ध तथा श्रीकृष्ण एवं षिषुपाल का द्वन्द्वयुद्ध होता है। अन्त में श्रीकृष्ण अपने सुदर्षन चक्र से षिषुपाल का सिर काट देते हैं और षिषुपाल के शरीर से एक तेज निकल कर कृष्ण के शरीर में प्रविष्ट हो जाता है तथा महाकाव्य समाप्त हो जाता है। 

इस महाकाव्य में लोक व्यवहार, राजनीति, संगीत, श्रृंगार, वीर आदि रसों का अच्छा चित्र खींचा गया है। कवि की प्रतिभा और पांडित्य का इसमें अच्छा परिचय मिलता है। जलक्रीड़ा, मधुपान, वन-विहार का वर्णन विस्तार के साथ मनोहर रूप में किया गया है। षिषुपालवधम् की गणना संस्कृत के श्रेष्ठतम महाकाव्यों में होती है।  

गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त के जीवन का संक्षिप्त  परिचय

महान् भारतीय गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त का जन्म सन् 598 ई. में राजस्थान के भीनमाल नामक नगर में हुआ था। इनके पिता का नाम जिष्णु था। ब्रह्मगुप्त को भिल्लमाल आचार्य के नाम से भी जाना जाता हैं। 

ब्रह्मगुप्त ने अपने बारे में बहुत थोड़ी जानकारी दी है। ‘ब्राह्मस्फुट-सिद्धांत’ के अंतिम ‘संज्ञाध्याय’ के दो श्लोकों में ब्रह्मगुप्त अपना संक्षिप्त परिचय इस प्रकार देते हैं-

श्रीचापवंषतिलके श्रीव्याघ्रमुखे नृपे शकनृपाणाम्।

पंचाशत्संयुक्तैर्वर्षषतैः पंचभिरतीतैः।।

ब्राह्मः स्फुटसिद्धांत सज्जनगणितज्ञगोलवित्प्रीत्यै।

त्रिंषद्वर्षेण कृतों जिष्णुसुतब्रह्मगुप्तेन।।

-संज्ञाध्याय

 

इससे पता चलता है कि ब्रह्मगुप्त ने अपना यह ग्रंथ चाप वंष के राजा व्याघ्रमुख के राज्यकाल में शक-संवत् 550 में लिखा और उस समय इनकी आयु 30 साल की थी। अर्थात्, ब्रह्मगुप्त का जन्म 598 ई. में हुआ था और 30 वर्ष की आयु (सन् 628 ई.) में उन्होंने अपने ‘ब्राह्मस्फुट-सिद्धांत’ की रचना की। 

ब्रह्मगुप्त के एक टीकाकार वरुणाचार्य ने उन्हें ‘भिल्लमालाचार्य’ कहा है। भिल्लमाल नगर लूनी नदी के तट पर बसा उत्तर गुजरात की राजधानी था। इसे श्रीमाल भी कहते थे। ब्रह्मगुप्त के समय में यह एक वैभवषाली नगर था। चीनी बौद्धयात्री युवान्-च्वाङ् ने जिस ‘पि-लो-मो-तो’ नगर का उल्लेख किया है, वह यही भिल्लमाल है। वर्तमान में यह जालौर जिले में स्थित है और भीनमाल के नाम से जाना जाता हैं।

ब्रह्मगुप्त के दो ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं- 1. ब्राह्मस्फुट सिद्धांत, 2. खण्ड-खाद्यक। ‘ब्राह्मस्फुट-सिद्धांत’ गणित और ज्योतिष पर केन्द्रित एक महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं। इस ग्रंथ में 24 अध्याय और कुल 1008 श्लोक हैं। 12वें ‘गणिताध्याय’ में अंकगणित और क्षेत्रमिति से संबंधित विषयों की जानकारी है और 18वें ‘कुट्टकाध्याय’ में बीजगणित का विवेचन है। ब्राह्मस्फुट सिद्धांत के साढ़े चार अध्याय मूलभूत गणित पर ही हैं।

‘खंड-खाद्यक’ एक करण यानी पंचांग की गणनाओं से संबंधित ग्रंथ है। खंड-खाद्यक का अर्थ है- खांड या गुड़ से बना खाद्य-पदार्थ। दो भागों (पूर्व और उत्तर) में विभक्त इस ग्रंथ में कुल 265 श्लोक हैं। यह भी पता चलता है कि ब्रह्मगुप्त ने अपने खंड-खाद्यक ग्रंथ की रचना 665 ई. में 67 वर्ष की आयु में की थी। इन दो प्रसिद्ध ग्रंथों के अलावा ब्रह्मगुप्त ने एक और पुस्तक लिखीं। उसका नाम ध्यानग्रह है और उसमें 72 श्लोक हैं। ब्रह्मगुप्त के जीवन के बारे में इतनी ही प्रामाणिक जानकारी मिलती है। 

प्रसिद्ध ज्योतिर्विद भास्कराचार्य ने ब्रह्मगुप्त को ‘‘गणचक्र-चूड़ामणि’’ की उपाधि दी एवं उनके मूलांकों को ही अपने ग्रन्थ ‘‘सिद्धांत षिरोमणि’’ का आधार बनाया।

ब्रह्मगुप्त न केवल एक महान् गणितज्ञ थे, बल्कि एक महान् वेधकर्ता भी थे। माना जाता है कि ब्रह्मगुप्त हर्षवर्धन साम्राज्य के अन्तर्गत गुर्जर प्रदेष के प्रख्यात नगर उज्जैन की अंतरिक्ष प्रयोगषाला के प्रमुख थे। उन्होंने ‘ब्राह्मस्फुट सिद्धांत’ की रचना ग्रहों का प्रत्यक्ष वेध करने के बाद ही की थी। वे मानते हैं कि जब कभी गणना और वेध में अंतर आने लगे तो वेध के द्वारा गणना को शुद्ध कर लेना चाहिए। ब्राह्मस्फुट-सिद्धांत के ‘यंत्राध्याय’ में उन्होंने कई ज्योतिष-यंत्रों की जानकारी दी है, और स्पष्ट लिखा है:-

गणितज्ञो गोलज्ञो गोलज्ञो ग्रहगतिं विजानाति।

यो गणितगोलबाह्यो जानाति ग्रहगतिं स कथम्।।

 

अर्थात्, जो गणित जानता है वह गोल (गोलीय खगोलिकी) को जानता है, और जो गोल को जानता है, वह ग्रहों की गति को जानता है। जो गणित और गोल से अनभिज्ञ है, वह ग्रहों की गति को कैसे जान सकता है ?

ब्रह्मगुप्त पहले ऐसे आचार्य थे जिन्होंने ज्योतिष और गणित के विभिन्न विषयों को अलग-अलग अध्यायों में बांटकर उल्लेखित किया। 

ब्रह्मगुप्त के ग्रन्थ में सबसे महत्व का विषय है बीजगणित। बीजगणित को उन्होंने कुट्टक कहा है और कुट्टकाध्याय में इसकी जानकारी दी है। ब्रह्मगुप्त ने बीजगणित का खूब विकास किया और ज्योतिष के सवाल हल करने में इसका इस्तेमाल भी किया। ब्रह्मगुप्त ने समीकरणों के बारे में नए हल सुझाए हैं।

आर्यभट ने अपने ‘आर्यभटीय’ ग्रंथ के ‘गणितपाद’ अध्याय में तत्कालीन गणित के सभी विषयों की संक्षिप्त जानकारी दी है। उन्होंने गणित के विषयों का कोई विभाजन नहीं किया। ब्रह्मगुप्त पहले भारतीय गणितज्ञ हैं जिन्होंने गणित को दो भागों में बांटा-पाटीगणित और बीजगणित। लेकिन उस समय तक बीजगणित शब्द अस्तित्व में नहीं आया था। ब्रह्मगुप्त ने बीजगणित के लिए ‘कुट्टक-गणित’ शब्द का प्रयोग किया है और ‘कुट्टकाध्याय’ में बीजगणित का अलग से विवेचन किया है। ‘कुट्टक’ का अर्थ है चूर-चूर करने वाला या चक्की। प्रथम घात के अनिर्धार्य समीकरणों (इन्डिटरमिनेट इक्वेषंस) को बार-बार की पुनरावृत्ति की एक विषेष विधि से हल किया जाता था, इसलिए यह कुट्टक शब्द अस्तित्व में आया था। बाद में व्यापक अर्थ वाले ‘बीजगणित’ तथा ‘अव्यक्त गणित’ शब्द अस्तित्व में आए। पहली बार ‘बीजगणित’ शब्द का प्रयोग ‘ब्राह्मस्फुट-सिद्धांत’ के टीकाकार पृथूदकस्वामी (860 ई.) ने किया है।

भारतीय गणित-ग्रंथों में अंकगणित के लिए प्रायः पाटीगणित शब्द का प्रयोग हुआ है। तख्ती के लिए संस्कृत के पुराने शब्द फलक या पट्ट हैं। पहले तख्ती या जमीन पर धूल बिछाकर गणनाएं की जाती थीं, इसलिए अंकगणित को कभी-कभी धूलिकर्म भी कहा जाता था। पाटीगणित और धूलिकर्म शब्दों के आधार पर ही अरबी के क्रमषः ‘इल्म-हिसाब अल्-तख्त’ और ‘हिसाब अल्-गुबार’ शब्द बने हैं। भारतीय मूल के अंकों को अरबी गणितज्ञ गुबार अंक (हरूफ अल्-गुबार) कहते थे। 

‘ब्राह्मस्फुट-सिद्धांत’ के ‘गणिताध्याय’ का पहला ही श्लोक है-

परिकर्मविंषतिं यः संकलिताद्यां पृथग्विजानाति।

अष्टौ च व्यवहारान् छायान्तान् भवति गणकः सः।।

 

अर्थात्, जो संकलित आदि 20 परिकर्मों को और छाया सहित 8 व्यवहारों को भली-भांति जानता है, वही कुषल गणक कहलाता है। पृथूदकस्वामी के अनुसार 20 परिकर्म हैं। -संकलित (जोड़), व्यवकलित (घटा), गुणन, भागहार, वर्ग, वर्गमूल, घन, घनमूल, पंच जाति (भिन्नों के पांच मानक रूपों में संबंधों को व्यक्त करने वाले पांच नियम), त्रैराषिक, व्यस्त-त्रैराषिक, पंचराषिक, सप्तराषिक, नवराषिक, एकादषराषिक, भांड-प्रतिभांड (विनिमय तथा लेन-देन)। आठ व्यवहार हैं- मिश्रक, श्रेढी, क्षेत्र, खात (उत्खनन), चिति (माल), क्राकचिक (आरी), राषि (ढेरी) और छाया।

ब्रह्मगुप्त ने अपने ग्रंथ में सभी प्रमुख परिकर्मों और व्यवहारों के संक्षिप्त नियम प्रस्तुत कर दिए हैं। आर्यभट की तरह ब्रह्मगुप्त का ग्रंथ भी पद्य मंे है, इसलिए इसमें संख्यांकों का प्रयोग नहीं हुआ। पर शून्य सहित केवल दस संकेतों से सभी संख्याएं व्यक्त करने की दाषमिक स्थानमान अंक-पद्धति आर्यभट के समय तक भारत में अस्तित्व में आ चुकी थी। ब्रह्मगुप्त ने भी इसी नई अंक-पद्धति का प्रयोग किया। बीजगणित में शून्य का उपयोग करने वाले ब्रह्मगुप्त पहले भारतीय गणितज्ञ हैं। ब्रह्मगुप्त से पूर्व गणना करते समय तीन (3) में से चार (4) घटाने पर आने वाले मान को भी शून्य (0) ही मान लिया जाता था। किन्तु ब्रह्मगुप्त ने पहली बार ऋणात्मक अंकों का सिद्धांत प्रस्तुत किया। उन्होंने नियम दिए हैं-

अ - 0 = अ

-अ - 0 = -अ

0 - 0 = 0

अ ग  0 = 0

0 ग  0 = 0

0 » 0 = 0

 

यद्यपि ब्रह्मगुप्त का यह कथन कि 0 » 0 = 0, सही नहीं माना गया। किन्तु उन्होंने अ » 0 को ‘तच्छेद’ कहा है, जो ठीक है। यहां ‘तच्छेद’ का तात्पर्य ‘ख-छेद’ यानी ‘अनंत’ है। भास्कराचार्य (1150 ई.) ने इसे ‘ख-हर’ (अनंत) राषि का नाम दिया।

भारतीय बीजगणित में अज्ञात राषि के लिए प्रायः यावत्-तावत् (जितनी कि उतनी मात्रा में) शब्द का प्रयोग हुआ है। ब्रह्मगुप्त ने अज्ञात के लिए वर्ण (रंग, अक्षर) शब्द का प्रयोग किया है। इसलिए कालांतर में अज्ञात के लिए कालक (का), नीलक (नी), पीतक (पी) आदि रंगों या अक्षरों का इस्तेमाल होता रहा। जोड़ के लिए यु (युत), भाग के लिए ‘भा’ और गुणा के लिए ‘गु’ अक्षरों का प्रयोग होता था। घटा के लिए $ चिह्न का प्रयोग देखने को मिलता है। यह चिह्न ब्राह्मी के ‘क’ अक्षर-जैसा है, और संभवतः ‘क्षय’ शब्द का संक्षेप है। 

गणित के क्षेत्र में ब्रह्मगुप्त की सबसे बड़ी उपलब्धि है अनिर्धार्य वर्ग-समीकरण अ य²$ 1 = र² का हल प्रस्तुत करना। पाष्चात्य गणित के इतिहास में इस समीकरण के हल का श्रेय जोन पेल (1668 ई.) को दिया जाता है और यह ‘पेल समीकरण’ के नाम से ही जाना जाता है। परंतु वास्तविकता यह है कि पेल के एक हजार साल पहले ब्रह्मगुप्त ने इस समीकरण का हल प्रस्तुत कर दिया था। इसके हल के लिए ब्रह्मगुप्त ने दो प्रमेयिकाएं (लैमाज) खोजी थीं। यूरोप के महान गणितज्ञ आयलर ने 1764 ई. में पुनः इसकी खोज की। आयलर ने ही अनिर्धार्य वर्ग-समीकरण को ‘पेल समीकरण’ का नाम दिया था। 

क्षेत्रमिति के क्षेत्र में भी ब्रह्मगुप्त की उपलब्धियां महत्त्वपूर्ण हैं। उन्होंने क, ख, ग, घ भुजाओं वाले चक्रीय चतुर्भुज का क्षेत्रफल दिया और बताया कि चक्रीय चतुर्भुज के विकर्ण परस्पर लम्बवत् होते हैं-

 

(स-क) (स-ख) (स-ग) (स-घ), जहां 2 स = क $ ख $ ग $ घ।

 

बाद में ब्रह्मगुप्त के इस प्रमेय को महावीराचार्य और भास्कर-द्वितीय ने काफी विकसित किया। ब्रह्मगुप्त ने पाई (π) का मान 10 के वर्गमूल = 3.16227766 के बराबर माना हैं। जो कि वर्तमान गणना 3.14159265 के अत्यधिक निकट हैं।

यूरोप में ज्ञान-विज्ञान के नवजागरण का दौर ईसा की ग्यारहवीं सदी से शुरू हुआ, जब ईसाई पंडितों को अरबी ग्रंथों का परिचय मिला और उनका लैटिन भाषा में अनुवाद होने लगा।

अरबी पंडितों ने सीरियाई, यूनानी और संस्कृत के ज्ञान-विज्ञान के ग्रंथों का अनुवाद करके अपनी भाषा को खूब समृद्ध बना लिया था। सर्वप्रथम जिन दो संस्कृत ग्रंथों से अरबी विद्वानों को भारतीय गणित और ज्योतिष की जानकारी मिली, उनकी रचना ब्रह्मगुप्त ने ही की थी। अरबों ने भारतीय गणित की अनेक विधियों, भारतीय अंक-पद्धति तथा अंक-संकेतों को अपनाया, और बाद में उन्हीं के द्वारा यूरोप में इनका प्रचार-प्रसार हुआ। ब्रह्मगुप्त को अरबी गणितज्ञों का एक आदिगुरु माना जा सकता है।

बगदाद के इतिहासकार अल-बरूनी ने अपनी किताब तारीक-अल हिन्द में इस बात का उल्लेख किया है कि बगदाद के खलीफा अल-मंसूर के शासनकाल में खलीफा के आदेष से भारतीय ज्योतिष एवं गणित के दो ग्रन्थों का अरबी भाषा में अनुवाद किया गया। अरबी में उनके नाम थे- सिंद हिंद और अल-करकंद। वास्तव में यह दोनों ग्रन्थ गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त के ग्रन्थों का अरबी में अनुवाद ही था। ब्रह्मगुप्त के इन ग्रन्थों से ही अरबों को पहली बार भारतीय गणित और ज्योतिष की जानकारी मिली। कालान्तर में अरबों ने ही इस ज्ञान को यूरोप में पहुंचाया था। 

अंग्रेज विद्वान कोलब्रुक ने 1817 ई. में ब्रह्मगुप्त के ग्रन्थ के कुट्टकाध्याय (बीजगणित) का अंग्रेजी में अनुवाद प्रकाषित किया। तभी जाकर यूरोप के विद्वानों को पता चला कि आधुनिक बीजगणित असल में भारतीय बीजगणित पर आधारित है। 

जब यूरोप में ज्ञान-विज्ञान के अंधकार का लंबा दौर चल रहा था, तब भारत में आर्यभट, ब्रह्मगुप्त, महावीराचार्य, भास्कराचार्य आदि कई महान गणितज्ञ पैदा हुए। आर्यभट-प्रथम (499 ई.) के साथ भारत में गणितीय अनुसंधान के एक नए युग की शुरुआत हुई थी। ब्रह्मगुप्त ने आर्यभट की परंपरा को आगे बढ़ाया, भारतीय गणित को अधिक समृद्ध बनाया। बीजगणित के क्षेत्र की उनकी उपलब्धियां विषेष महत्त्व की हैं। ब्रह्मगुप्त निष्चय ही अपने समय के संसार के एक महान गणितज्ञ थे। विज्ञान के प्रख्यात इतिहासकार जाॅर्ज सार्टन का भी कथन है- ‘‘ब्रह्मगुप्त भारतभूमि के एक महान वैज्ञानिक थे; अपने समय के एक सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक थे।’’