काली बाई पैनोरमा, मांडवा, डूंगरपुर

काली बाई पैनोरमा, मांडवा, डूंगरपुर

परियोजना का नाम: वीरबाला कालीबाई पेनोरमा, माण्डवा 

(बजट घोषणा 2016-17 पेरा संख्या 59.0.0)

वित्तीय स्वीकृति: 165.09 लाख रूपये

भौतिक प्रगति: पेनोरमा का निर्माण कार्य प्रगति पर है

कालीबाई के जीवन का संक्षिप्त परिचय

वागड़ क्षेत्र में नव जागरण का शंखनाद करने वाले और षिक्षा की ज्योति जलाने हेतु स्वयं का जीवन अर्पित करने वाले डूंगरपुर जिले के शहीद नानाभाई व वीरांगना काली बाई का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में मंडित है।

अंग्रेजी परतन्त्रता के काल में स्वतन्त्रता सेनानियों और देषभक्तों द्वारा स्थान-स्थान पर पाठषालाएं संचालित कर बालकों में देषप्रेम और सद्संस्कारों के साथ सामाजिक कुरीतियों के विरोध में उठ खड़े होने की षिक्षा देने का प्रयत्न किया जा रहा था। इन पाठषालाओं के माध्यम से अंग्रेजों की सत्ता के विरुद्ध जनमानस तैयार करने का कार्य भी किया जा रहा था। ये प्रयास अंग्रेजी हुकूमत की आंखों में खटकने लगे। उन्होंने देखा कि षिक्षा के माध्यम से यह नवजागरण देषवासियों को उनके विरूद्ध उठ खडे़ होने में सहायक सिद्ध हो रहा है। अतः उन्होंने इस तरह के उन सभी प्रयासों - जो सद्संस्कार और स्वतन्त्रता की चेतना जाग्रत करने वाले हों - को कुचलने का प्रयत्न किया। चाहे वह गोविन्द गुरु की सम्पसभा हो, सेवासंघ हो या प्रजामंडल के कार्यक्रम और उनके अन्तर्गत गांव-गांव में चलाई जा रही पाठषालाएं। 

डूंगरपुर के निकट पूनावाड़ा गांव में षिवराम भील द्वारा एक विद्यालय चलाया जा रहा था। दिनांक 1 जून, 1947 को रियासत के सिपाही इस विद्यालय को तोड़ने पहंुच गए और पूनावाड़ा स्कूल के अध्यापक षिवराम भील को उठाकर ले गये। जागरूक कार्यकर्ताओं ने एकत्रित होकर जब षिवराम भील को छोड़ने की मांग की तो पुलिस द्वारा उन पर लाठियां बरसाई गई और 38 लोगों को गिरफ्तार कर धम्बोला की जेल में डाल दिया गया। इन सभी लोगों पर भारतीय दण्ड संहिता 124-ए के अन्तर्गत राजद्रोह का प्रकरण चलाया गया। इस तरह राज्य द्वारा बलपूर्वक पाठषालाओं को बंद करवाया जा रहा था।

डूंगरपुर जिले के छोटे से गांव रास्तापाल में भी सेवा संघ की पाठषाला श्री नानाभाई खांट के घर में संचालित होती थी। उस पाठषाला के अध्यापक श्री सेमा भाई रोत थे। नानाभाई हुकूमत की इस तरह की कठोर कार्रवाइयों से विचलित नहीं हुए और अपने यहां संचालित पाठषाला को चालू रखने का निर्णय करते हुए उन्होंने प्रण लिया कि जब तक मेरी जान रहेगी तब तक मैं अपने गांव रास्तापाल की पाठषाला को बन्द नहीं होने दूंगा। अपने इस प्रण की रक्षा हेतु नानाभाई खाट और विरांगना कालीबाई शहीद हो गए। इन विभूतियों का जन्म पिछड़े एवं आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में हुआ किन्तु ये श्रेष्ठ जीवन मूल्यों और अटूट संकल्प शक्ति के धनी थे। इन्होंने अपने आत्मबल से विकट परिस्थितियों का मुकाबला किया और इतिहास के पृष्ठों में ही नहीं अपितु जनमानस के हृदय में ऐसे रच-बस गए कि सदा-सदा के लिए अमर हो गये।

19 जून 1947 को जिला मजिस्टेªट श्री जवेरीलाल चैबीसा, डी.एस.पी. श्री बाबूलाल श्रीवास्तव कुछ राजकीय सिपाहियों के साथ रास्तापाल गांव में चल रही सेवासंघ की इस पाठषाला बन्द कराने पहुंच गये। वहां पहुंचकर उन्होंने स्कूल अध्यापक श्री सेगा भाई रोत व संरक्षक श्री नानाभाई खांट को मारा-पीटा और पाठषाला के बच्चों को भी मारपीट कर भगा दिया गया। स्कूल चलाने के अपराध में अध्यापक सेंगा भाई को क्रूरतापूर्वक रस्सियों से बांधकर ट्रक के पीछे बांधकर घसीटना शुरू किया। लोगों ने इन्हें छुड़ाने का प्रयास किया तो उनको बेरहमी से बन्दूक के कुन्दे से मारा गया। जब ये लोग बेसुध होकर जमीन पर गिर पड़े तो सिपाही सेंगा भाई को ट्रक के पीछे घसीटते हुए ले जाने लगे। लोग यह दृष्य देखकर दहल उठे। इसी पाठषाल में पढ़ने वाली 13 वर्षीय बालिका काली बाई को यह दृष्य देखा नहीं गया। अपने गुरु पर इस तरह का क्रूर अत्याचार होते देखकर उस नन्हीं सी आदिवासी षिष्या कालीबाई का खून खौल उठा और वह दराती लेकर ट्रक की रस्सी काटने को दौड़ी पड़ी। इस बालिका के अदम्य साहस ने अन्य लोगों को भी प्रेरणा दी। कुछ महिलाएं व बच्चे भी इसकी मदद के लिए दौड़े और वीरंागना काली बाई ने दराती लेकर रस्सी काट दी।

इस घटना से बौखलाये रियासती सिपाहियों ने मजिस्टेªेट के आदेष से गोलियां चला दी। काली बाई को गोली लगने से वह बेसुध होकर गिर पड़ी। उसके साथ सेंगा भाई को छुड़ाने आये नवल बाई, मोगी बाई, लाली बाई, होमली बाई व सोहन लाल के भी गोलियां एवं छर्रे लगे। इस नृषंस घटना ने रास्तापाल गांव के लोगों और पाठषाला के छात्रों को उत्तेजित कर दिया। वे लोग इस क्रूरता का बदला लेने के लिए आ जुटे और वारी-ढ़ोल बजाने लगे। वारी-ढ़ोल सुनकर आस-पास के आदिवासी लोग अपने पारम्परिक हथियारों से लैस होकर घटना स्थल पर पहुंच गए। लोगों को उमड़ता देखकर जिला मजिस्टेªट और डी.एस.पी. अपने लवाजमे के साथ भाग छूटे। घायल काली बाई की मृत्यु 20 जून 1947 की रात्रि को हो गई। उसका दाह संस्कार गागली नदी के किनारे हजारों लोगों की उपस्थिति में किया गया।

पिछड़े आदिवासी समुदाय की बालिका कालीबाई ने अत्यन्त अल्पजीवन जी कर भी अन्याय के प्रति संघर्ष और स्त्री षिक्षा के महŸव का आदर्ष चरितार्थ किया। षिक्षा की अलख जगाने के लिए समर्पित कालीबाई का यह बलिदान अविस्मरणीय रहेगा। वीरांगना कालीबाई ने अपने प्राणों की आहूति देकर गुरुभक्ति का जो अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया, वैसा उदाहरण संसार भर में दुर्लभ हैं।