गुरु गोविन्द सिंह पैनोरमा, बुढाजोहड़, रायसिंहनगर, श्रीगंगानगर

गुरु गोविन्द सिंह पैनोरमा, बुढाजोहड़, रायसिंहनगर, श्रीगंगानगर

परियाजना का नाम : गुरु गोविन्द सिंह पैनोरमा, बुढाजोहड़, रायसिंहनगर, श्रीगंगानगर

(बजट घोषणा 2017-18, 176.01.0)

वित्तीय स्वीकृति : 300.00 लाख 

भौतिक प्रगति : पेनोरमा निर्माण का कार्य प्रगति पर है।

 

शहीद नगर गुरूद्वारा साहिब बुढा जोहड़ (राजस्थान) का इतिहास

 

यह स्थान राजस्थान प्रान्त के जिला श्रीगंगानगर की रायसिंहनगर तहसील के गांव डाबला के कोई एक किलोमीटर की दूरी पर करनी जी नहर के किनारे पर स्थित है।

शहीद नगर गुरूद्वारा बुढा जोहड़ के साथ सिख इतिहास का सम्बन्ध 17वीं शताब्दी की शुरूआत में जुड़ता है। बुढा जोहड़ का अर्थ है पुराना छप्पड़ यहां 20 मुरब्बे नीची जगह है जहां बरसात के मौसम में कई मीलों तक का पानी नीचे की तरफ चलता हुआ इकट्ठा हो जाता था।

बाबा बंदा सिंह बहादुर की शहादत के बाद मुगल हुकूमत ने पंजाब के सिक्खों पर जुल्म जबर की हद कर दी फर्खुसिअर बादशाह ने हुकुम जारी किया कि जहां भी कोई सिख मिले उसे कत्ल कर दो। सिखों के सिरों की कीमत डलने लगी। उस जुल्म जबर के दौर में हुकूमत ने सिखों को पंजाब से अपने घर बार छोड़कर दूर दराज के इलाकों पर जाने केलिए मजबूर कर दिया।

सन् 1731 ई. में नादर शाह ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया यहां से बेशुमार दौलत लूटी और पंजाब से होते हुए अफगानिस्तान को लौट रहा था सिखों ने उस के काफिलों पर हमले करके बहुत सारा माल और बहुत सारी नौजवान लड़कियों को उनके काफिलों से मुक्त करवाकर उनके घर वापस पहुंचाया। नादर शाह इस बात से बहुत क्रोधित हुआ और जकरिया खान को सिखों का नामों निशान मिटाने का हुक्म दिया सिखों के विरूद्ध लाहौर से जकरिया खान ने फौज भेजी माझे से नवाब जकरियाखान के सताए हुए दुआबे से आदिना बेग फौजदार जालंधर मालवे से सूबा सरहद के जुल्मों का शिकार हुए सिख विपदा के समय अपने घर बार छोड़ के राजस्थान की बीकानेर रियासत के मरूस्थल वीरान जंगल में आ गए इस जगह पर पानी काफी तादाद में था यहां पर ही डेरे लगा लिए क्यांकि जकारिया खान ने सिखों के खात्मे के लिए अमृतसर के चौधरियों और सरकारी मुखबिरों को सिखों के विरूद्ध पूरी तरह तैयार किया हुआ था जंडयाले गुरू के हरी भगत निरंजनिये मंडियाली का मस्सा रगड़, करमा छिना, रामा रंधावा, नौशहरे वाले जोध नगरिया मजिठा के चौधरियों ने इस काम में सरकार की पूरी पूरी सहायता की। 

इस जुल्म के दौर में सिखों की एक जत्थेदारी ने शहीद नगर बुढ जोहड़ वाले स्थान को अपनी रिहायशगाह बनाया हुआ था उस समय यह स्थान बिलकुल उजाड़ जंगल बियावान था जिसमें जहरीले सापों की भयानक फुन्कारों का शोर रहता था। 

सन् 1740 ई. में इस स्थान पर सिखों के एक जत्थे ने जत्थेदार बुढा सिंह जी जत्थेदारी में डेरा लगाया हुआ था उस समय भाई बलाका सिंह नाम के सिख ने खबर दी कि सिखों के पंजाब छोड़ने के बाद मकंडयाली गांव के मस्सा रगड़ ने श्री हरमंदिर साहिब पर कब्जा कर लिया है वहां शराब के दौर चलते है कन्जरियों के नाच होते है गुरू घर की घोर बेअदबी हो रही है।

भाई बलाका सिंह ने दुखदायी खबर सुन के वहां इकट्ठे हुए सारे सिख जोश में आ गए समय की नजाकत को देखते हुए जत्थेदार बुढा सिंह की इच्छा और हाजिर सिखों के फैसले अनुसार दो सूरमे महिताब सिंह मीरा कोट और स. सुखा सिंह माड़ी कंबोकी ने श्री हरमंदिर साहिब अमृतसर की पवित्रता को बहाल करने का बीड़ा उठाया और मस्सा रंगड़ का सिर काट कर बुढा जोहड़ लाने के लिए अरदास की। अरदास के बाद दोनों सूरवीर घोड़ों पर सवार होकर अमृतसर को चल दिए। 

इतिहास में जिक्र मिलता है कि ये दोनों सूरमे बुढा जोहड़ से चलकर श्री दमदमा साहिब तलवंडी साहिब पहुचें और अपनी सफलता की अरदास के लिए दमदमा साहिब में हाजिर हुए तो उस समय दशम पातशाह की बाणी के बारे में विवाद चल रहा था। सिखों का एक समूह दशम पातशाह की बाणी को अलग अलग पोथियों में ही रहने देना चाहता था सुखा सिंह महिताब सिंह की अरदास के समय इस विवाद का फैसला यह हुआ कि अगर भाई सुखा सिंह महिताब सिंह दुष्ट मस्सा रंगड़ का सिर काट का उसका कटा हुआ सिर लेकर सही सलामत बुढा जोहड़ वापिस पहुंच जाते है तो दशम पातशाह की सारी बाणी एक जिल्द में एकत्रित कर दशम ग्रन्थ का स्वरूप तैयार किया जायेगा अगर वो इस काम में सफल ना हो सके तो दशम पातशाह की बानी अलग अलग पोथियों में ही रहने दी जाएगी गुरू की मेहर का सदका भाई महताब सिंह और सुखा सिंह अपने उद्देश्य में सफल हो गए मस्सा रंगड़ का सिर काट कर बुढ जोहड़ लाया गया इस तरह दशम पातशाह की बाणी के बारे में छिड़े विवाद का अंत हुआ। 

भाई सुखा सिंह महिताब सिंह ने तरनतारन के नजदीक पहुंचकर गांव के चौधरियों का भेष बना कर अपने गांव का मामला भरने के बहाने ठीकरियों की थैलियों भर ली जब दोनों सिख अमृतसर पहुंचे तो पहले ही तैयार योजना अनुसार उन्होंने अपने घोड़े अकाल बुगें के सामने ईलायची बेरी से बांध दिए और अरदास कर के दोनों सूरमे हरमंदिर साहिब पहंुचे तो मस्सा रगड़ अपनी लुच्च मण्डली के साथ हरमंदिर साहिब में खाट पर बैठा हुक्का पी रहा था कन्जरियां नाच रही थेी और शराब के दौर चल रहे थे। जब उस को कहा गया कि चौधरी मामला भरने आये है। तो उन्हें थैलियां पेश करने का हुक्म दिया थैलियां पेश होने पर मस्सा रंगड उठ कर उन्हें देखने लगा तो भाई महिताब सिंह ने फुर्ती से अपने श्री साहिब का वार कर के उस का सर धड़ से अलग कर दिया खुखा सिंह ने पलक झपकते ही मस्सा रगड़ के कटे सर को अपने भाले पर टांग लिया वहां अफरा तफरी मच गयी वहां इक्कठा सारी लुच्च मंडली भाग गई दोनों सूरमे भाले पर टंगे सिर को लेकर फुर्ती से अपने अपने घोड़ों पर सवार होकर अमृतसर की सीमा को पार कर गए। ये दोनों सूरमे अपनी की हुई अरदास को पूरा करते हुए वापिस बुढा जोहड़ को चल दिए रात, हनुमानगढ शहर के पास काटी यहां से चल कर सुखा सिंह महिताब सिंह बुढा जोहड़ बाबा बुढा सिंह के जत्थों के सिखों के पास आ पहुंचे और मस्सा रंगड़ का कटाा हुआ सिर वहां एकत्रित खालसा दल के दीवान में पेश किया इस कार्य की सफलता के लिए शुक्राने की अरदास की गई।

कुछ समय बाद महिताब सिंह जी बुढा जोहड़ से वापिस अमृतसर जाते समय किसी मुखबिर की सूचना पर पकड़े गए और लाहौर मेंबहुत तसीहे देकर शहीद कर दिए गए, महिताब सिंह की शहादत के बाद सुखा सिंह माड़ी कंबोकी भी अपने जत्थे के साथ पंजाब आ गए इन सूरमों ने मुगल हुकूमत के विरूद्ध अपना संघर्ष शुरू कर दिया सन् 1746 ई. में काहनुवान (गुरदासपुर) के स्थान पर यह घटना हुई जिसे सिख इतिहास में छोटे घल्लुघारे के नाम से याद किया जाता है इस घल्लुघारे में सुखा सिंह भी शहीद हो गए। 

स. बन्दासिंह बहादर की शहादत के बाद 17वीं सदी की शुरूआत में मुगल हुकूमत के जुल्म जबर से बचने के लिए और विपदा का समय टालने के लिए दल खालसा के सिख इस बुढा जोहड़ के स्थान पर कुछ समय के लिए आ गए जिस कारण इस स्थान का सिख इतिहास से महत्वपूर्ण सम्बन्ध है जत्थेदार बुढा सिंह के नाम पर इस स्थान का नाम बुढा जोहड़ रखा गया। 

सन् 1947 तक बुढा जोहड़ की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया पंजाबी काश्तकारों के बीकानेर रियासत में जमीने खरीदने के कारण पंजाबी आबादी की गिनती की हो गई सारा इलाका और हरा भरा हो गया।

शहीद नगर गुरूद्वारा साहिब बढा जोहड़ की नींव सन् 1953 में संत फतह सिंह जी द्वारा रखी गई कुछ कच्चे मकान और पानी की डिग्गी 1954 में बनायी गई गुरूद्वारे और लंगर का खर्चा चलाने के लिए 2 मुरब्बे जमीन खरीदी गई। 

27 फरवरी 1956 को गुरूद्वारा साहिब की पक्की ईमारत का काम शुरू हुआ इस काम में हरनाम सिंह ठेकेदार ने बहुत योगदान दिया। इलाके के श्रद्धालुओं ने अपने ट्रैक्टर, ईंटों, सीमेन्ट और हाथों से सेवा करके अधिक से अधिक योगदान दिया। गुरूद्वारा साहिब के मेन हॉल की लम्बाई चौड़ाई तकरीबन 124ग99 है। हाल में एक ही समय में हजारों की तादाद में श्रद्धालुओं के बैठने का खुला प्रबन्ध है। इसके अलावा एक बहुत बड़ा दीवान हॉल है। जिस में अमावस पर दीवान लगता है। गुरूद्वारा साहिब के अन्दर निर्मल जल का एक सुन्दर सरोवर है। जिसमें हजारों श्रद्धालु स्नान करते है। जिस के चारों ओर संगमरमर की परिक्रमा बनी हुई है। इस सरोवर की गहराई 12 फुट है। सरोवर में खराब पानी निकालने और ताजा पानी अन्दर लाने के लिए एक हसली बनी हुई है। गुरूद्वारा साहिब के आस पास आमों का बाग है। यहां पर हर महीने की अमावस्या को मेला लगता है जिस में दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। यहां बड़ा भारी मेला लगता है। अमावस्या पर लंगर पकाने की सेवा आस पास के सिख और माताऐं, बहने करती है। 

लंगर के लिए बहुत बड़े-बड़े हॉल है। जहां एक समय में हजारों की तादाद में श्रद्धालु लंगर छकते है। इसके अलावा लंगर में गैस भटियां का इंतजाम है। संगतों के रात ठहरने के लिए करीब 120 कमरे बने हुए है। सभी कमरों में चारपाई और बिस्तर भी है पंखे लगे हुए है। अब चपाती बनाने के लिए मशीन लगी हुई है। 

गुरू ग्रन्थ साहिब जी के सुख आसन के लिए सचखंड हाल बना हुआ है। जिसको परदेस के श्रद्धालुओं ने बनवाया है। साथ ही लंगर हॉल की ईमारत, सरोवर की परिक्रमा और कॉलेज की ईमारत, विद्यार्थियों के रहने के लिए कमरे भी परदेस की संगतों द्वारा ही बनवाए जा रहे हैं। 

शहीद नगर गुरूद्वारा साहिब बुढा जोहड़ में दो विद्यालय चल रहे हैं। एक सुखा सिंह भाई महिताब सिंह विद्यालय है जिस में करीब एक सौ बच्चे हैं। जिनके रहने सहने के लिए लंगर पानी, साबुन तेल आदि का खर्च लिखाई, पढ़ाई का खर्च शहीद नगर गुरूद्वारा साहिब बुढा जोहड़ ट्रस्ट द्वारा किया जाता है। इसके अलावा एक सिख मिशनरी कॉलेज भी चल रहा है जिस में करीब 90 विद्याथी हैं। जिनको संगीत विद्या दी जाती है। गुरूद्वारा ट्रस्ट की तरफ से विद्यार्थियों की ओर प्रोफेसरों के रहने, खाने-पीने लंगर आदि की व्यवस्था की जाती है। कॉलेज और विद्यालय के बच्चों को वजीफा भी दिया जाता है।ं। स्कूल और कॉलेज के किसी बच्चें से किसी पकार का कोई चचार्ज नहीं लिया जाता है। सब कुछ निःशुल्क है और वजीफा अलग से दिया जाता है। इस स्कूल और कॉलेज के सैकड़ों बच्चें देश-विदेश में ग्रंथी और रागी की भूमिका निभा रहे हैं।

इस शहीद नगर गुरूद्वारा बुढ़ा जोहड़ के प्रबन्ध के लिए संत फतेह सिंह जी द्वारा एक ट्रस्ट बना दिया गया था जिसके 13 मैंबर है।