धन्ना भगत पैनोरमा, धुंवाकला , टोंक

धन्ना भगत पैनोरमा, धुंवाकला , टोंक

परियोजना का नाम : धन्ना भगत पेनोरमा, धुवांकलां, टोंक

(बजट घोषणा 2016-17 पेरा संख्या 59.0.0)

वित्तीय स्वीकृति: 140.04 लाख रूपये

भौतिक प्रगति : पेनोरमा निर्माण का कार्य प्रगति पर है।

धन्ना भगत के जीवन का संक्षिप्त परिचय

नाम:- भक्त षिरोमणि धन्ना भगत।

पिता:- धन्ना भगत के पिता का नाम रामेष्वर जी था। ये हरचतवाल गोत्र के जाट थे। 

जन्म काल:- सन् 1415 ई. (वि. सं. 1472)।

जन्म स्थान:- धुआंकला, टोंक।

चारित्रिक विषेषताएं:- धन्ना भगत का जन्म एक निर्धन कृषक परिवार में हुआ था। कृषि के साथ पशुपालन भी इनकी आजीविका का साधन था। बचपन से ही इनके मन में ईष्वर के प्रति अटल आस्था उत्पन्न हो गई और धीरे-धीरे इनकी धार्मिक प्रवृत्ति बढ़ती गई। धन्ना भगत ने काषी जाकर रामानंद को अपना गुरु बनाया। रामानंद के प्रमुख बारह षिष्यों में इनकी गणना होती है। रामानंद जी ने इनको घर पर ही ईष्वर की भक्ति करने और साधु-संतों की सेवा करने की प्रेरणा दी। धन्ना भगत गृहस्थ जीवन में रहते हुए ईष्वरीय साक्षात्कार और सत्संग करने में लीन रहे। ईष्वरीय कृपा से इनके द्वारा अनेक चमत्कार घटित हुए, जिससे इनकी उच्च कोटि की भक्ति भावना की कीर्ति चारों ओर फैल गई। 

जीवन की प्रमुख चमत्कारिक घटनाएं:- एक बार इनके घर एक साधु महात्मा आये। वह शालग्राम भगवान् की सेवापूजा करते थे। बालक धन्ना बडे़ गौर से इनको पूजा करते देखा करते थे। उसके मन में भी शालग्राम की पूजा करने की इच्छा जाग्रत हो उठी और जब वह साधु जाने लगे तो उनसे वह मूर्ति मांगली। साधु ने शालग्राम की बटिया देते हुए कहा, पहले इनकी पूजा करना, इनको भोग लगाना, तत्पष्चात् स्वयं भोजन करना। इनकी पूजा प्रतिदिन हो, इसका पूरा-पूरा ध्यान रखना। अगले दिन धन्ना ने शालग्राम की पूजा की और भोग लगाया किन्तु भगवान् ने भोजन नहीं किया। बालक धन्ना ने सोचा कि जब तक ये भोग नहीं लगा लेते, मैं भोजन कैसे कर सकता हूं। धन्ना तीन दिन तक भूखा-प्यासा रहकर प्रतीक्षा करता रहा कि कब भगवान् प्रसाद पाए और कब वह भी भोजन करे। भगवान् ने सोचा, तीन दिन हो गए हैं। मैं भोजन नहीं करूंगा तो यह भी भूखा मर जायेगा। धन्ना की ऐसी अटल और निष्कपट भक्ति देखकर भगवान् ने प्रत्यक्ष होकर भोजन किया। अब तो यह धन्ना का नियमित क्रम बन गया। एक वर्ष बाद वह साधु पुनः धन्ना भगत के घर आये तो यह सारा घटनाक्रम जानकर आष्चर्यचकित रह गये। साधु के बार-बार आग्रह करने पर धन्ना ने उनको भी भगवान के स्वयं आकर भोग ग्रहण करने की अवस्था के दर्षन करा दिये। 

एक बार सन्तों का समूह गांव में आया। धन्ना खेत में बीज बोने जा रहा था। सन्तों को भूखा जानकर, धन्ना ने सारा अनाज सन्तों को दे दिया। पता लगने पर पिता ने पूछा तो धन्ना ने उत्तर दिया, बीज घुन लगा हुआ था। काम का नहीं था। वही सन्तों को दिया है। बोने के लिए अच्छा बीज मेरे पास है, मैं बो दूंगा आप चिन्ता नहीं करें। धन्ना ने हाली को बुलाकर खेत में हल फिरवा दिया किन्तु बीज नहीं ओरा। ओरता तो तब, जब बीज होता। भगवद्कृपा से पांचवे दिन खेत में बीज उगने प्रारम्भ होगए। धन्ना के खेत में पड़ौसियों के खेत से सवाया अन्न उत्पन्न हुआ। 

धन्ना का हाली फसल तैयार होने पर अनाज बैलगाड़ी में भरकर गांव में ला रहा था। रास्ते में ही भूखे-प्यासे सन्त आ गये। धन्ना से सभी को एक-एक तूंबा भरकर अन्न देदिया। कुछ ही दिनों में खेत में अपने-आप तूंबे उगने लगे। सारे खेत में तंूबे ही तूंबे हो गये। कार्तिक मास तक समस्त तूंबे पककर तैयार हो गये। धन्ना ने सोचा कि चलो अच्छा है, ये तूंबे सन्त महात्माओं को भेंट करने के काम आयेंगे। धन्ना ने एक तूंबे को तोड़कर उसका मुंह बनाया तो उसमें अनाज भरा हुआ निकला। धन्ना ने देखा कि सभी तूंबो में अन्न भरा हुआ है। धन्ना तो परम वैष्णव संत थे। सभी तूंबो को बैलगाडी में भरकर गांव के दरबार के पास ले गया और कहने लगा, खेत में मैंने कुछ बोया नहीं। बिना बोये ही अन्न उग आया है। अतः यह मेरा न होकर दरबार का है। दरबार ने कहा, आप भगवद्भक्त हैं। भगवान् ने ही आपकी सहायतार्थ यह सब कुछ किया है। अतः इस अन्न पर आपका ही अधिकार है। धन्ना भगवदृकृपा समझकर अन्न को घर ले आया और भगवान् की भक्ति में लीन रहने लगा। ईष्वर की कृपा के इन चमत्कारों से धन्ना भगत की कीर्ति चारों ओर फैल गई।

सामाजिक/साहित्यिक/आध्यात्मिक योगदान:- नाभादास कृत ’भक्तमाल’ एवं अनन्तदास कृत ’धन्ना की परची’ से विदित होता है कि भक्त षिरोमणि धन्ना महान् संत रामानन्द के षिष्य थे। ये कबीर, नामदेव, रैदास, सेन आदि संतों से प्रेरणा लेकर भक्ति के मार्ग पर आगे बढे़ और वाराणसी जाकर रामानन्द जी के षिष्य बने। उन्होंने अनेक पदों की रचना की। इनके कुछ पद गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं। इनके पदों में एक मात्र प्रभु का ही गुणगान करने और नाम-स्मरण की प्रबल भावना प्रकट हुई है। धन्ना ने अपने पदों में ईष्वर की सहज सरल भक्ति करने और नाम स्मरण का मार्ग सुझाया। उन्होंने अन्य सब चतुराई को छोड़कर एकमात्र प्रभु के गुणगान पर ही बल दिया है। 

धन्ना भगत का जातीय भेदों में भी विष्वास नही था। वे कहते है कि सभी प्राणियों में एक ही ईष्वर का निवास है, तो फिर ऊँच-नीच का भेद कैसा। धन्ना के इस तरह के विचारों का लोकजीवन में बहुत प्रभाव पड़ा और अनेक लोग उनके षिष्य होकर सदाचार और भक्तिमार्ग की ओर प्रवृत्त हुए। 

राजस्थान के लोकगीतों, लोककथाओं और जनश्रुतियों में धन्ना भगत की कीर्तिगाथा अक्षुण्ण है।