चालकनेची पैनोरमा, चलकना (तन्नोट माता जन्मस्थान), बाड़मेर

चालकनेची पैनोरमा, चलकना (तन्नोट माता जन्मस्थान), बाड़मेर

परियोजना का नाम: चालकनेची पेनोरमा, चालकना (तन्नोट माता का जन्मस्थान) 

(बजट घोषणा 2017-18 पेरा संख्या 66.0.0)

वित्तीय स्वीकृति : 400 लाख 

भौतिक प्रगति : पेनोरमा निर्माण का कार्य प्रगति पर है।

श्री तनोट माता मंदिर का संक्षिप्त परिचय

लोकपूज्य तनोट माता हिंगलाज माता का ही एक रूप हैं। जैसलमेर राज्य के माड़ क्षेत्र में ‘चेलक’ निवासी मामडि़या जी चारण के कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्त करने की लालसा में उन्होंने हिंगलाज शक्तिपीठ की सात बार पैदल यात्रा की। एक बार माता ने स्वप्न में आकर उनकी इच्छा पूछी तो उन्होंने कहा कि आप मेरे यहां जन्म लें। माता कि कृपा से मामडि़या जी के यहां 7 पुत्रियों और एक पुत्र ने जन्म लिया। उन्हीं सात पुत्रियों में से एक आवड़ (माता तनोट राय) ने विक्रम संवत 808 में चैत्र सुदी नवमी मंगलवार को मामडि़या जी चारण के यहां जन्म लिया। इनके बाद जन्मी भगवती की 6 बहिनों के नाम आषी, सेसी, मेहली, होल, रूप व लांग था। अपने अवतरण के पश्चात् भगवती आवड़ जी ने बहुत सारे चमत्कार दिखायें तथा नगणेची, काले डूंगरराय, भोजासरी, देगराय, तेमड़ेराय व तनोट राय नाम से प्रसिद्ध हुई। 

जैसलमेर के मंझमराव के पुत्र राव केहर (वि.सं. 816) और उसकी रानी कमलावती झाली जो कि अरणेंडागढ़ के राव भाण की पुत्री थी, ने संतान प्राप्ति हेतु तनोट माता से प्रार्थना की। तनोट माता ने उनको दर्षन दिए और पुत्रवती होने का आषीर्वाद देकर पुत्र का नाम तणु रखने का निर्देष दिया। माता ने उनको स्वप्न में शुभ स्थान पर किला बनाने का भी आदेष दिया। पुत्र जन्म के बाद राव केहर ने पुत्र तणु के नाम से तणोटगढ़ बनवाया जिसकी आधारषिला विक्रम संवत् 827 (सन् 770 ई.) आषाढ़ कृष्णा 5, शुक्रवार के दिन रखी गई और वि.सं. 844 (सन् 788 ई.) माघ शुक्ला पूर्णिमा मंगलवार के दिन किले का निर्माण कार्य पूर्ण हुआ। उसी दिन आवड़ माता ने नवनिर्मित मन्दिर में स्वयं सहित सभी भगिनियों की मूर्तियां स्थापित करवाकर विधिपूर्वक प्राण-प्रतिष्ठा करवाई जिसकी प्रसिद्धि ‘तणोटिया देवी (तणोटिया माता)’ या ‘तणोट राय’ के मन्दिर के रूप में हुई।

तनोट माता का मंदिर जैसलमेर से करीब 130 कि.मी. दूर भारत-पाकिस्तान बॉर्डर के निकट स्थित है। यह मंदिर लगभग 1200 साल पुराना हैं। यह मंदिर सदा ही आस्था का केंद्र रहा है पर 1965 की भारत-पाकिस्तान की लड़ाई के बाद यह मंदिर देष-विदेष में अपने चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध हो गया। 1965 की लड़ाई में पाकिस्तानी सेना की तरफ से गिराए गए करीब 3000 बम भी इस मंदिर पर खरोच तक नहीं ला सके, यहां तक कि मंदिर परिसर में गिरे 450 बम तो फटे तक नहीं। ये बम अब मंदिर परिसर में बने एक संग्रहालय में भक्तों के दर्षन के लिए रखे हुए हैं।

इसी प्रकार 1971 के भारत-पाक युद्ध में माता तनोट की कृपा से शत्रु के सैंकड़ों टैंक व गाडि़यां भारतीय फौजों ने नेस्तानाबूद कर दिये और शत्रु सेना पलायन करने के लिए विवष हो गई। अतः माता श्री तनोट राय जनसमुदाय के साथ ही भारतीय सैनिकों व सीमा सुरक्षा बल के जवानों की श्रद्धा का विषेष केन्द्र हैं।