कृष्णभक्त अलीबख्श पैनोरमा मुण्डावर, अलवर

कृष्णभक्त अलीबख्श पैनोरमा मुण्डावर, अलवर

परियोजना का नाम : कृष्णभक्त अलीबख्श पैनोरमा मुण्डावर, अलवर

(बजट घोषणा : 2017-18, 66.0.0)

वित्तीय स्वीकृति : 250.00 लाख 

भौतिक प्रगति : पेनोरमा निर्माण का कार्य प्रगति पर है।

कृष्णभक्त अलीबख्श के जीवन का संक्षिप्त परिचय 

16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में राजस्थान एवं हरियाणा की लोकनाट्य परम्परा (ख्याल एवं सांग) को विकसित एवं सुदृढ़ आधार प्रदान करने वाली शृंखला में अलीबख्श का नाम अग्रणी है। अलीबख्श की गायन एवं मंचन शैली का अपना विशेष स्थान है। हरियाणा के दक्षिणी-पूर्वी अंचल जैसे रेवाड़ी, नारनौल, महेन्द्रगढ़, तावडू, गुड़गांवा, बल्लभगढ़ एवं इनके समीपवर्ती बहरोड़, किशनगढ़ एवं अलवर भूभाग (जो कि सांस्कृतिक दृष्टि से एक समान है) में विशेष रूप से प्रचलित एवं लोकप्रिय लोकनाट्यों में अलीबख्श के लोकनाट्य सर्वोपरि हैं।

अलीबख्श के जन्म, शिक्षा एवं परिवार के विषय में किसी को भी निश्चित जानकारी नहीं है। उदयपुर, लोककला मण्डल के संस्थापक श्री देवी लाल सामर ने राजस्थान की लोकसंस्कृति एवं लोककला के सन्दर्भ में काफी प्रशंसनीय कार्य किया है। उन्हीं की हस्तलिखित सामग्री के आधार पर डॉ0 महेन्द्र भानावत ने ‘‘राजस्थानी लोकनाट्य की प्रवृत्तियां’’ नामक अपनी पुस्तक में अलीबख्श का समय सन् 1845 से 1866 तक माना है। डॉ0 राम नारायण अग्रवाल ने ‘‘संगीत: एक अध्ययन’’ में तथा डॉ0 पूर्णचन्द शर्मा ने ‘‘हरियाणा की लोकधर्मी नाट्य परम्परा’’ में यही समय स्वीकार किया है। इनके जन्म-काल के विषय में कोई अन्तःसाक्ष्य नहीं मिलता। अभी तक हम जितने भी पुराने 70-75 तथा 80-85 वर्ष के कला प्रेमी बुजुर्गों से मिले, उन्होंने बताया कि हमने अलीबख्श को नहीं देखा है। हां, उनके विषय में हमारे पिता जी अवश्य बताया करते थे। बताते थे कि हजारों की संख्या में दूर-दूर से लोग इकट्ठे हो जाया करते थे और बड़ी तन्मयता के साथ इनके खेल देखा करते थे। इससे यह लगता है कि इनका समय एक सौ वर्ष से पहले का ही होगा। इस प्रकार 16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ही इनका स्थितिकाल उपयुक्त लगता है। इनकी आयु भी ज्यादा नहीं बताई जाती है। कहा जाता है कि 50-55 की अवस्था में ही इनका देहान्त हो गया। 

अलीबख्श के जन्म के विषय में मुंडावर के मास्टर सूरजभान ने एक कथा सुनाई है, जो कि उनके पिता जी उन्हें सुनाते थे। जिला अलवर के एक गांव मुंडावर में एक जागीरदार थे, उमराव जी, इन्हें लोग राव जी कहा करते थे। पास की पहाड़ी में दो साधू तपस्या किया करते थे। राव जी की पत्नी उनके दर्शन करने चली गई। उन दोनों साधुओं में से एक उन पर मोहित हो गया, दूसरे ने इस बात को ताड़ लिया। उनके चले जाने पर उसने अपने साथी से कहा कि तुम्हारी तपस्या भंग हो गई, उसने स्वीकार किया, पूछा कि कैसे प्रायश्चित किया जाए, उसने बताया कि अब तो उसके गर्भ से जन्म लेना पड़ेगा। तभी उसका शरीर छूट गया और राव जी की पत्नी गर्भवती हो गई। समय पर बालक का जन्म हुआ, लेकिन पैदा होने पर उसने दूध नहीं पीया। अन्त में पहाड़ पर तपस्या करने वाले उसी महात्मा को बुलाया गया। उन्होंने बच्चे के कान में कुछ कहा और आशीर्वाद दिया तब बच्चे ने दूध पीना शुरु कर दिया। इसी बालक का नाम अलीबख्श रखा गया। इसकी तपस्या के विषय में कह पाना मुश्किल है लेकिन इतना अवश्य है कि अलीबख्श साधारण प्रतिभा के व्यक्ति नहीं थे। वह असाधारण प्रतिभा के धनी थे। किसी जन्म के भ्रष्ट योगी थे। इनके विवाह के बारे में भी लोगों से अलग-अलग बातें सुनने को मिलीं। कुछ कहते हैं इन्होंने विवाह किया था और इनके एक लड़की भी थी, कुछ कहते हैं कि विवाह ही नहीं किया। इनकी एक बहिन बताई जाती है जिसका नाम बीबी अम्मन था और जो मुंडावर में रहती थी। बाद में अलवर के राजा उसे अलवर ही ले गये और उसकी पेन्शन कर दी।

इनके लोकनाट्य रचनाकार बनने की भी बड़ी दिलचस्प कहानी है। इनके विषय में लोगों की दो प्रकार की धारणाएं हैं। एक तो कहा जाता है कि इन्हें संगीत एवं खेल-तमाशे देखने का शौक था। एक बार पेहल गांव में कोई तमाशा (सांग) हो रहा था, यह भी चले गये और मंच पर बैठ गये। मण्डली के मुखिया ने ताना मार दिया कि ठाकुर साहब मंच पर बैठने का शौक है तो अपनी मण्डली बना लो। इस ताने से इनका हृदय बिंध गया। तभी वहां से उठकर चल दिये। स्वाभिमानी व्यक्ति थे, सोचा कि अब जीना बेकार है। पास के ही पहाड़ पर जाकर आत्महत्या करने का विचार किया, ज्यों ही गिरने के लिए तैयार हुए तभी किसी ने पीछे से पकड़ लिया। वह एक महात्मा थे। उन्होंने गिरने का कारण पूछा तो इन्होंने अपनी सारी व्यथा सुनाई। उन्होंने आशीर्वाद दिया, ‘‘चिन्ता मत करो, अब सरस्वती तुम्हारे कण्ठ में विराजेगी, तुम मंशा देवी के मन्दिर में जाकर मंशा देवी की स्तुति करो। जो भी तुम कहोगे वही काव्य बन जायेगा और लोगों में तुम्हारी पूजा होगी।’’ इन महात्मा का नाम संत गरीबदास बताया जाता है।

अन्तःसाक्ष्य के आधार पर इनके जन्म-स्थान, जाति तथा गुरु विषयक जानकारी मिली है। साथ ही गुरु-कृपा तथा भगवदास्था का भी परिचय मिलता है। इनका कहना है-

‘‘राजपूत हूं टीकावत, मेरा अलबख्श है नाम।

नगर मुंडावर सुबस बसो जो मेरा निजधाम।।

जो मेरा निजधाम, राम ने देख जहां पर जाया।

मैं डूबत लिया तिराय, प्रभु थारी अजब अनोखी माया।।

मैं तो हुआ मरण को त्यार, नाथ थाने अपने हाथ बचाया।

गरीबदास की मेहर से, सो मैंने मन चाहा वर पाया।

सच्चे सांई सरजनहार दास का बेड़ा लगा दो पार।।’’

गुरु से मनचाहा वर पाकर उनके आदेशानुसार सबसे पहले इन्होंने मंशा देवी की स्तुति की। इसी से इनके नये जीवन का श्रीगणेश हुआ-

‘‘मन की मंशा है यही, मंशा देवी आज।

आज सभा के बीच में, रखो हमारी लाज।।

आज लाज रख दो महामैया, और खेलन का वर दो।

तेरे द्वारे खड़े खिलार, ख्याल से पेट इन्हों का भर दो।।

अजी जे तेरा मंशा नाम है, म्हारी मंशा पूरण कर दो।

अलीबख्श आ पड़ा चरन में, हाथ शीश पर धर दो।।

कंठ खुले सुर ताल मिले, कुछ ऐसी किरपा कर दो।

दुर्गे तुम्हें मनाता हूं, शीश चरणों में झुकाता हूं।।’’

इसी से मिलती-जुलती दूसरी कहानी यह है कि एक बार किसी का तमाशा होने वाला था। इनके नौकर ने इनका मूढ़ा मंच के सामने डाल दिया, भीड़ ज्यादा हो गई तब लोगों ने बीच से इनके मूढ़े को एक तरफ फेंक दिया। इसी बात से इन्होंने अपना बहुत अपमान समझा। तभी विचार किया या तो ऐसा कुछ कर दिखाऊँ जिससे लोग पीछे-पीछे घूमें या फिर इस शरीर को छोड़े दूँ। पहाड़ में जाकर तपस्या की और महात्मा गरीबदास के आशीर्वाद से सरस्वती सिद्ध की। तत्पश्चात् इन्होंने अपनी अलग मण्डली बनाई और अपनी रचनाएं रचकर उन्हें मंच पर प्रस्तुत करना शुरू कर दिया। इसके बाद पेहल में ही इनकी शिष्य मण्डली की वहां की मण्डली से प्रतियोगिता हुई जिसमें इनकी मण्डली की श्रेष्ठता सिद्ध हुई।

इस प्रकार ऐसा प्रतीत होता है कि कोई-न-कोई देवी शक्ति या प्रेरणा अवश्य थी जिसने इन्हें साधारण से असाधारण बना दिया। इस आस्था का ही परिणाम है कि इन्हें हिन्दुओं के देवी-देवताओं एवं मुसलमानों के पीर-पैगम्बरों में कोई अन्तर ही दिखाई नहीं दिया बल्कि समभाव रहा। सभी में उन्हें उसी सर्वव्यापक परमात्मा की छवि प्रतिबिम्बित होती दिखलाई पड़ती रही। इसीलिए यह साम्प्रदायिकता के तुच्छ धरातल पर कभी नहीं रहे बल्कि मानवता की उच्चतम भावभूमि पर प्रतिष्ठित रहे। यही कारण है कि इनके मन में सबके प्रति समभाव बना रहा। 

इन्होंने कला को साधना के रूप में लिया। कला को सरस्वती का प्रसाद मानकर उसे उच्चतम शिखरों पर ही रखा। उसे सस्ता, बिकाऊ व व्यावसायिक नहीं बनने दिया। लोकरंजन व लोकमंगल दोनों का समन्वय ही इनकी कला का उद्देश्य था। जहां भी इनके लोकनाट्यों का मंचन होता था, वहां के लोगों को कह देते थे कि मण्डली के लिए रहने, खाने-पीने का प्रबन्ध कर देना बाकी मैं स्वयं करूंगा। वहां जो भी धनराशि एकत्र होती, उसे वहीं के विकास के लिए दान कर देते। मर्यादा एवं अनुशासन के यह हामी थे। कलाकार के गायन एवं अभिनय में जहां भी जरा सी कसर दिखाई देती उसे वहीं रोक देते थे। मूढ़ा डालकर बैठ जाते थे। अभिनय में स्वयं भाग नहीं लेते थे। रचना स्वयं करते थे। इन्होंने अपनी रचनाओं में भक्ति, प्रेम, शृंगार, करुणा, हास्य आदि सभी भावों को अनुस्यूत कर दिया। इनमें लोकजीवन एवं लोकसंस्कृति की झलक सर्वत्र देखने को मिलती है।

यह स्वाभिमानी बहुत थे। अपने मान-सम्मान को आंच नहीं आने देते थे। अलवर के तत्कालीन राजा ने कई गांव इन्हें जागीर के रूप में दे रखे थे। वह इनके संगीत के बहुत प्रेमी थे लेकिन विचित्र बात यह है कि कभी भी अलवर में इन्होंने अपना खेल नहीं दिखाया। इस विषय में ऐसा कहा जाता है कि यह स्वयं उच्च समझे जाने वाले चौहान वंश के थे और अलवर के राजा नरूथा गोत्र के राजपूत थे, जिन्हंे कि चौहान गोत्र की अपेक्षा कम महत्व दिया जाता था। कहते हैं, एक बार अलवर नरेश ने इन्हें अपने यहां तमाशा करने को कहा लेकिन इन्होंने उन्हें कहलवा दिया कि तमाशा देखने का शौक है तो यहीं आकर देख लो। इससे इनकी स्वाभिमान की भावना झलकती है। वस्तुतः इकबाल के इस शेर के द्वारा इनकी इस भावना को यों प्रस्तुत किया जा सकता है-

‘‘मेरा तरीक अमीरी नहीं, गरीबी है,

खुदी न बेच, गरीबी में नाम पैदा कर।’’

आखिर तक इन्होंने इस खुदी को कोई आंच नहीं आने दी।

ऐसा कहा जाता है कि एक बार यह आबू जा रहे थे। वहां पहुंचते-पहुंचते रात हो गई। राजा का निवास स्थान वहां से कई मील था। सोचा रात को कहीं आसपास विश्राम कर लें। पास में एक मन्दिर था, उसमें रात बिताने का विचार बनाया। मन्दिर का द्वार खटखटाया, पुजारी ने दरवाजा खोला, बातचीत हुई, पूछा क्या नाम है, कहां से आए हो ? परिचय दिया गया तब पुजारी ने यह कहकर मना कर दिया कि तुम मुसलमान हो, यह हिन्दुओं का मन्दिर है, यहां नहीं रह सकते। यह कहकर उसने दरवाजा बन्द कर लिया। उन्होंने अपनी मण्डली से कहा कि बाहर ही अपना डेरा डाल लो और कर दो अपना खेल शुरू। इन्होंने अपने साज-बाज ठीक किये और कृष्ण लीला का कार्यक्रम शुरू कर दिया। आसपास के सभी लोग वहां एकत्र हो गये। इन्होंने भजन एवं गीत इतनी बुलन्द और ऊँची आवाज में गाये कि रात के सन्नाटे में कोसों तक सुनाई दिए। संयोग से अलवर नरेश भी उस समय आबू में थे उनके कान में भी इनके संगीत की भनक पड़ी। उन्होंने तुरन्त अपने सेवक को घोड़ा देकर भेजा कि अलीबख्श लगते हैं, उन्हें लिवा लाओ। सेवक पहुंचा, राजा का सन्देश मिला, अलीबख्श ने उत्तर दिया, ‘‘अब कार्यक्रम शुरू हो चुका है, अधूरा नहीं छोड़ेंगे, राजा को देखना है तो स्वयं आ जाएं।’’ सेवक ने आकर राजा को यही बात बतला दी। राजा से न रहा गया, स्वयं जाकर वहां बैठे रहे और सुबह होने पर इन्हें लिवाकर ले गये। पुजारी ने भी अपनी गलती स्वीकार की और अलीबख्श से क्षमा मांगी। वस्तुतः ऐसे कलाकारों के लिए कला ही धर्म होता है और मानवमात्र का कल्याण इनकी कला तथा इनके जीवन का उद्देश्य होता है। ये इसके लिए समर्पित होते हैं। रसखान की इसी कला, आस्था एवं भक्तिभावना को परिलक्षित करके भारतेन्दु हरिशचन्द्र ने मुक्तकण्ठ से कहा है कि ‘‘इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिक हिन्दू वारिये।’’ यह कथन अलीबख्श पर भी उतना ही खरा उतरता है क्योंकि ऐसे उदारमना कलाकार, मानवता के विशाल फलक पर अपनी कला के माध्यम से ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’’ का सन्देश देते हैं तथा इनकी उदारता को एक शायर के ही शब्दों में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है-

‘‘तुम उठो, उठकर गिरा दो, बीच की दीवार को,

देखना आंगन तुम्हारा, दो गुना हो जायेगा।’’

अलीबख्श अपने शिष्यों के प्रति बहुत स्नेहभाव रखते थे। पूरण और गोपाल इनके प्रमुख शिष्य थे। इनकी रचनाओं में इन दोनों का नाम कई बार आया है। एक बार की घटना है कि इनके प्रिय शिष्य पूरण के यहां एक छोटा बच्चा गुजर गया था। उससे वह बहुत दुःखी था। अलीबख्श स्वयं तो सान्त्वना देने के लिए पहुंच न सके लेकिन उसे किसी के हाथ पत्र लिख कर भेजा-

‘‘बन्दे गई चीज को क्यों रोवे,

रो-रो प्राण तू क्यों खोवे,

ये दुनिया स्वारथ की सारी,

भजन बिना दिन क्यों खोवे,

सत साबन से मन को मांज ले,

गम के तुखम को क्यों बोवे,

मोह माया के फंस फन्दे में

अब गफलत में क्यों सोवे,

कहें अलीबख्श मन समझा पूरण,

मेहर करे तो प्रभु फिर होवे।’’

इस उद्बोधन-गीत में जहां एक ओर ‘‘गतासून् गतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः’’ वाली ध्वनि है तो दूसरी ओर संसार की असारता तथा भजन की सार्थकता का भावबोध है। इन्होंने सत् वस्तु के ज्ञान एवं असत्मय दुःख के परित्याग का सन्देश देते हुए अन्त में उसे आश्वस्त भी कर दिया कि परमात्मा की कृपा से फिर से बच्चा हो सकता है। गुरु के इस प्रेरणामय आशीर्वाद से पूरण के सभी दुःख दूर हो गये।

एक बार इनका एक शिष्य बहुत बीमार हो गया। उसे रेवाड़ी के हकीम के पास ले जाने पर उसने कहा कि इसका इलाज कर दूंगा लेकिन एक शर्त है, शर्त यह है कि अलीबख्श के तमाशों की एक-एक प्रति हमें दे दो। उन्हें हम प्रकाशित करवायेंगे। अलीबख्श अपनी रचनाओं को प्रकाशित करवाने के बिल्कुल पक्ष में नहीं थे लेकिन शिष्य के उपचार के लिए यह शर्त भी मान ली। सन् 1867 में हकीम सैय्यद मकबूल हुसैन सादिक ने मतबा मकबूल आम, रेवाड़ी में इन्हें हिन्दी तथा उर्दू में छपवाया। इनमें से हमें ‘कृष्ण लीला’, ‘फिसाने अज़ाइब’ तथा ‘पद्मावत’ हिन्दी में मिले। ‘‘गुलबकावली’’ के कुछ पृष्ठ उर्दू में मिले। बाकी सबकी हस्तलिखित प्रतियां ही प्राप्त हुईं।

संगीत के क्षेत्र में अलीबख्श सिद्धहस्त थे। इन्हें अनेक राग-रागनियों का ज्ञान था। इस विषय में भाड़ावास के सेवानिवृत्त कर्नल जयदयाल सिंह ने बताया कि उनके गांव का ही झाड़मल सोनी उर्फ बीढ़ा सुनार, अलीबख्श का अच्छा मित्र भी था और संगीतकार भी। वैशाख-जेठ की कड़कती गर्मी के दिन थे। तपती दोपहर में जोहड़ के किनारे पेड़ के नीचे ये दोनों बैठे थे। झाड़मल ने अलीबख्श से मल्हार गाने का आग्रह किया उन्होंने बैरुत राग गाने से बहुत मना किया लेकिन उसने एक न मानी और गाने के लिए विवश कर दिया। जब इन्होंने मल्हार राग गाना शुरू किया तब एक बदली-सी उठी और जबरदस्त बरसात हो गई। इससे इनकी गायन विद्या की कुशलता का संकेत मिलता है।

इनके तमाशे अपनी बंकिम काव्याभिव्यक्ति एवं मनमोहक नाट्य कौशल से उस युग के जनमानस को सम्मोहित किये हुए थे। इनकी लोकप्रियता के विषय में अनेक घटनाएं सुनने को मिलीं। इस प्रसंग में भी कर्नल जयदयाल सिंह ने अपने गांव में घटित एक घटना का वर्णन किया कि एक बार ‘‘निहाल दे’’ का सांग हो रहा था, झूला झूलने के प्रसंग के समय आकाश में बादल-से छा गये और वर्षा होने लगी। वर्षा धीरे-धीरे बढ़ती गई लेकिन दर्शकों ने आग्रह किया कि उस्ताद बीच में रोको मत, चलने दो। सांग चलता रहा, लोग मूसलाधार वर्षा में भी उसका रसास्वादन करते रहे। यह इनके तमाशों की लोकप्रियता का सूचक है। अन्तःसाक्ष्य से भी इसकी पुष्टि होती है-

‘‘मैं हूं ठाकर राठ का, अलीबख्श मेरा नाम।

इश्क तमाशे का लगा, मेरा छुटा मुंडावर ग्राम।।

छुटा मुंडावर गांव, आनकर जस दुनिया में लिया।

गांव-गांव में करे तमाशे, नाम बड़ों का किया।।’’

इनके गीत-भजन जन-जन में बहुत लोकप्रिय थे। यद्यपि औरतें उस समय सांग देखने नहीं जाया करती थीं, फिर भी उन्हें इनके ये गीत-भजन बहुत याद थे और चक्की चलाते समय भी इन्हें गाया करती थीं।

रेवाड़ी के श्री मुन्ना लाल जैन, कपड़ा व्यापारी ने बताया कि उनके पिता अलीबख्श के बहुत कायल थे। वे और उनके सहयोगी अलीबख्श के लोकनाट्यों का मंचन रेवाड़ी में करवाते थे। उनका यह कहना है कि उस समय 15-20 हजार की संख्या में लोग दूर-दूर से आकर अलीबख्श का तमाशा देखते थे। तमाशा सारी-सारी रात चलता रहता था और लोग इतने मन्त्रमुग्ध होते थे कि उठने का नाम नहीं लेते थे भले ही उनके सिरों पर से थाली क्यों न फिरा दें। एक घटना उन्होंने अपने पिता की सुनाई। उन्होंने बताया कि उनके पिता जी अलीबख्श की कला के इतने प्रेमी थे कि रात-रात भर उनकी रचनाओं को गाते रहते थे। एक बार घर में चोर घुस गये। पिता जी अलीबख्श की राग-रागनी गा रहे थे। चोरों ने सोचा कि जब सो जायेंगे तभी चोरी करेंगे। इन्तजार करते-करते रात बीत गई और वह गाते ही रहे। उन्हें निराश होकर लौटना पड़ा। पता तब चला जब सुबह देखा कि कोने में बुझी बीड़ियों का ढेर लगा पड़ा था। लगता है चोरी करने के लिए आये चोर भी मधुर गीतों की मस्ती में खो गये। अलीबख्श के गीतों ने घर में चोरी होने से बचा ली।

इनकी मुख्य कर्मभूमि रेवाड़ी थी। बताते हैं कि रेवाड़ी के घन्टेश्वर महादेव के मन्दिर के जीर्णोद्धार में कुछ आर्थिक कमी पड़ी। तब अलीबख्श को बुलाया गया। उन्होंने घन्टेश्वर की स्तुति भी की और अपने लोकनाट्यों का मंचन करके इतनी धनराशि एकत्र कर दी कि मन्दिर का अपूर्ण कार्य पूरा हो गया और फिर भी पैसा बचा रहा। यह शिव-स्तुति देखते ही बनती है-

‘‘घंटेश्वर घट में बसे, घंटन की घनघोर।

सुबह शाम दर्शन करें, लोग आवते दौर।।

लोग आवते दौर, मच रहा शोर, शहर के अन्दर।

तेरे गुण गावत तर गये, गुरू गोरखनाथ, मछन्दर।।

तुम बणे जोग की खान, ज्ञान के कहिये आप समन्दर।

शहर रेवाड़ी बीच बणो, आपका इक मन्दिर।

सुमरूँ घंटेश्वर महादेव, म्हारे कभी न आवे खेव।।’’

सम्भवतः भारतवर्ष का यही एकमात्र मन्दिर ऐसा है जिस पर मुसलमान भक्त कवि की शिव-स्तुति संगमरमर के पत्थर पर खुदवा कर मन्दिर के मुख्य द्वार पर लगवाई हुई है। यह बहुत ही गौरव की बात है।

अलीबख्श के लोकनाट्यों में गायन, अभिनय एवं नृत्य तीनों का समन्वय था। इनमें से मंचन तथा नृत्य तो अब समाप्त ही हो गया है। यदि कुछ बचा है तो मात्र गायन ही। इसमें मुंडावर में पुरानी पीढ़ी के लोगों में (तीन वर्ष पूर्व श्रेष्ठ गायक श्री हजारी लाल के दिवंगत हो जाने पर) अब केवल मास्टर गूजरमल जी हैं, बीच की पीढ़ी में श्री ओम प्रकाश व मास्टर रामविलास हैं, नई पीढ़ी के एक-दो लड़के भी इस दिशा में प्रयत्नशील हैं।

रचना परिचय:

सतत् प्रयास करने पर अलीबख्श की ये सात रचनाएं- ‘‘कृष्ण लीला’’, ‘‘पदमावत्’’, ‘‘निहाल दे’’, ‘‘नल-दमन-छड़ाव’’, ‘‘नल-दमन-बगदाव’’, ‘‘फिसाने अज़ाइब’’ एवं ‘‘गुलबकावली’’ मिली हैं। अभी तक इनकी दो रचनाएं- ‘‘शिवदान सिंह का बारहमासा’’ तथा ‘‘अलवर का सिफतनामा’’ बहुत प्रयास करने पर भी नहीं मिल पाई हैं। इसलिए हमें उपर्युक्त सात रचनाओं पर ही सन्तोष करना पड़ा है लेकिन इन रचनाओं से भी इनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर पूरा प्रकाश पड़ जाता है। इन्हीं से इनकी काव्यात्मकता, नाटकीयता, संगीतात्मकता, कलात्मकता, सांस्कृतिक एकता, समन्वयशीलता एवं लोकजीवन के प्रति सहज सजगता की झलक मिल जाती है।