मावजी महाराज पैनोरमा, बेणेश्वर, डूंगरपुर

मावजी महाराज पैनोरमा, बेणेश्वर, डूंगरपुर

परियोजना का नाम: मावजी महाराज पेनोरमा, बेणेश्वरधाम 

(बजट घोषणा 2017-18 पेरा संख्या 66.0.0)

वित्तीय स्वीकृति : 150 लाख 

भौतिक प्रगति : पेनोरमा निर्माण का कार्य प्रगति पर है।

संत मावजी महाराज के जीवन का संक्षिप्त परिचय

डूंगरपुर जिले के उत्तर-पूर्वी सीमा पर माही से करीब 5 कि.मी. उत्तर-पष्चिम में स्थित साबला गांव जिसे चैपड़े में सबलापुरी कहा गया है, में सहस्त्र औदिच्य ब्राह्मण परिवार में दालाम ऋषि तथा केसर देवी के यहां माघ शुक्ला पंचमी संवत् 1772 (सन् 18 जनवरी 1716 ई.) को होने का उल्लेख मिलता है। मावजी स्पष्टतः अपभ्रंष शब्द है।

पालोदा हरिमंदिर के षिलालेख में मावजी के जन्म एवं विवाह का उल्लेख दिया है जिसका वर्णन जीवनदास एवं टुडोर ने अपने ग्रंथ अमृतसार में भी किया है।

श्रीस्तमजी.................

।। स्वस्तिश्रीसदाविजयोमंगलम्........ संवत् 1784 वर्षेमाघमासे शुभे शुक्ल पक्षे तिथौ।। चन्द्र नगर सबलापुरामधैदालमऋषिग्रहे भार्या केसरजकुक्षेश्री महाव्यमनोहरजी अखण्डथ किष्न निकलंकीअवतार सूत्रधराकरी श्रीवेण वृनदावनधाम करौ। संवत् 1850 वर्षे माघषुक्ल पक्षे तिथौ।।.......

शेषपुर स्थित भूगंल पुराण के एक कोने पर लिखा है- संवत् 1757 भाद्रपद ई. सन् 1701 एकादाषी शुक्ल पक्ष दालम ऋषि ने त्यां प्रगट्या जो मावजी के जन्म को प्रमाणित करती है।

धर्माचरण कि षिक्षा अपने पिता श्री दालाम (वालम) ऋषि से मिली। बाद में गुरु सहजानन्द से योग की षिक्षा प्राप्त की। 12 से 24 वर्ष की आयु तक 12 वर्ष साबला के सुनैया पर्वत की गुफा में तपस्या की।

मावजी का विवाह भी छोटी आयु में हो गया। एक-एक कर उनके चार विवाहों का उल्लेख मिलता है। पहला विवाह कूपड़ा की छोटी औदिच्य कन्या रूपीजी से, दूसरा गामड़ा ब्राह्मणिया की वखतूजी से, तीसरा साहूजी नामक राजकुमारी से।

पालोदा हरिमंदिर के षिलालेख में उनके विवाह तथा पुत्र उदयानन्द एवं पुत्रवधू जनकुंवरी के पीठाधीष्वर बनने का उल्लेख मिलता है।

संत मावजी का चैथा विवाह सागवाड़ा की गुजराती पाटीदार मनुबाई से होना तथा उनके पुत्र नित्यानन्द का पीठाधीष्वर बनना उक्त लेख से प्रमाणित होता है। गृहस्थ जीवन के बाद भी मावजी का रुझान समाज सुधार और अध्यात्म की ओर बढ़ता गया।

14 वर्ष की आयु तक आते-आते मावजी पूर्णतः भक्ति एवं जनकल्याण को समर्पित हो चुके थे। वि.सं. 1784 में उन्होंने बेणेष्वर में गादी (पीठ) स्थापित कर माव परम्परा आरम्भ की। रास लीलाओं के माध्यम से जन-षिक्षा, पतितोद्धार तथा उन्हें समाज में सम्मानजनक स्थान दिलवाने हेतु प्रयास किये। जिसके कारण तत्कालीन अभिजात्य वर्ग का भारी विरोध भी सहना पड़ा। तत्कालीन निम्न समझे जाने वाले वर्ग को साद (षुद्ध या पवित्र) संज्ञा देकर उन्हें मंदिर प्रवेष व पूजा का अधिकार देते हुए माघ शुक्ला पूर्णिमा को होने वाले महारास में खेलने का अधिकार दिया। इसी कारण समाज में अव्यवस्था फैलाने के आरोप में तत्कालीन डूंगरपुर महारावल षिव सिंह द्वारा गिरफ्तार करवाया गया किन्तु चमत्कारिक व्यक्तित्व एवं जन समर्थन को देखते हुए छोड़ दिया गया। 

1784 से 1789 तक मावजी यहां रहे किन्तु जेल से रिहा होने के पश्चात् वे कभी लौटकर बेणेष्वर नहीं आये।

जेल यात्रा के पश्चात् वे वापस बेणेष्वर गये ही नहीं। देह तो अहमदाबाद में त्यागी किन्तु पंचतत्व में विलीन शेषपुर में हुए। जहां उनकी समाधि बनी हुई हैं।

संत मावजी भक्ति के साथ समाज सुधारक भी थे। उनकी षिक्षाएं उनकी भविष्यवाणियों के रूप में उनके चैपड़ों में सुरक्षित हैं। अपने उपदेषों में उन्होंने घोषणा की थी कि एक दिन जात पांत का भेद मिट जायेगा।

पूर्णतः अषिक्षित होते हुए भी विलक्षण प्रतिभा का परिचय देते हुए शास्त्रीय राग-रागिनियों के आधार पर कृष्णलीलाओं पर गीतों एवं भविष्यवाणियों की रचना की जिन्हें उनके षिष्यों मुनि सर्वानन्द, विष्वामित्र, पूर्णानन्द, विष्वकीर्ति, प्रेमानन्द, जज्ञेष्वर आदि ने लिपिबद्ध किया तथा शल्पदा और चित्रलेखा ने प्रसंगानुसार चित्रण किया। शेषपुर चैपड़े के लोक मान्यता के अनुसार ये ग्रंथ बारह पोठी (एक पोठी यानि एक बैल का बोझा)। कागज पर लाख (लाक्षा) की स्याही व बांस की कलम से हस्तलिपि में लिखे गये हैं। 

लगभग 72,66,000 भविष्यवाणियों के अतिरिक्त कृष्णलीलाओं, बारहमासा व भजनों के माध्यम से माव के निष्कलंक रूप का वर्णन हैं।

संत होने के साथ-साथ वह एक विलक्षण साहित्यकार भी थे। उनके षिष्य भी उसी कोटि के रचनाकार थे।

माव साहित्य को चैपड़ों के आधार पर चार भागों में बांटा गया है:-

1. सामसागर, 2. मेघ सागर, 3. रतन सागर, 4. प्रेम सागर, 5. अनन्त सागर।

संत मावजी एक अल्पायु बाल संत थे। कुमार अवस्था में ही गृहस्थी के साथ-साथ भक्ति भाव में रम गये थे। वे एक विलक्षण प्रतिभा के धनी गृहस्थ संत थे। लगभग 24 वर्ष की आयु में आते-आते पीठ की स्थापना तथा समाज को दिषा देने वाली वाणियां उनके व्यक्तित्व की विषालता की परिचायक हैं।

विधवा जीवन मयहोय अने अन्य प्रसस्य सुं रमण करे तो बीज उदय थाय (गर्म रहें) अने कुलभय पामी ने गर्भपात करे अनिति जावणी। गर्भ धरें नहीं तो बहुभरधार करें माटे रखवीं नहीं। पोतानी न्यात मुद्रा माहें देवी। अने इच्छाप्रमाणे गई तो तथास्तु। ‘‘तत्कालीन समय समाज में वर्ग विषेष को सम्मान देते हुए उन्हें साद (पवित्र) का दर्जा दिया तथा अपनी माव परम्परा में षिक्षित किया।’’ उन्हीं के संग बेणेष्वर के संगम तीर्थ पर रास लीलाएं की। माव का व्यक्तित्व एवं कर्म दोनों नारी उत्थान पर केन्द्रित रहा। तत्कालीन समाज की वर्ण प्रथा के साथ ही व्याप्त अन्य बुराईयों को मिटाने के लिये उन्होंने ब्राह्मण होते हुए भी चैथा विवाह सागवाड़ा के गुजराती पटेल समाज की विधवा मनुबाई से करके अन्तर्जातीय सम्बन्धों एवं विधवा विवाह जैसे आदर्षों को मूर्त रूप दिया।

संत मावजी ने अपने जीवन काल में लगभग 17,66,000 वाणियां दी हैं जिन्हें भाखणी कहा जाता हैं।

एक बार मावजी ने माँ से गायें चराने का आग्रह किया और गायें लेकर गये। वहां मावजी तो बैठकर बाँसुरी बजाने लगे। वे अपनी धुन में खो जाते और गायें भागकर आसपास के खलिहान में पहुंच जातीं। इस प्रकार की षिकायत जब माँ के पास घर पहुंची तो माँ ने शाम को बालक माव को खम्भे से बांधना चाहा। पर जैसे ही वे उसे बांधने लगीं तो रस्सी छोटी पड़ गयी। माँ ने नाराज होकर थप्पड़ मारा जैसे ही मुँह खोला उसके मुँह में सारा ब्रह्माण्ड दिखाई दिया जो पहले कभी नहीं देखा। 

आबुदरा एक अथाह दर्रा है। कहते हैं एक बार मावजी उसमें कूद पड़े। चारों और त्राही-त्राही मच गयी। सब लोग आबुदरे पर एकत्र हुए किन्तु आष्चर्य कुछ ही समय बाद मावजी पुनः प्रकट हुए। इस बार उनके हाथ में कमल का पुष्प था। 

तीसरे विवाह की लोक मान्यता के अनुसार वह धार की राजकुमारी साहु कुंवरी थी। एक दिन स्वप्न में मावजी ने उसे देखा तथा उसकी साड़ी के पल्लू पर लिख दिया। भगवान के मावजी के रूप में दषम अवतार साबला में ले लिया हैं। वे बेणेष्वर धाम पर बिराजते हैं, तुम वहीं आकर मिलना। राजकुमारी प्रातःकाल उठी तो देखा- उसके हाथ में कांकण डोरे बंधे हुए थे तथा ओढ़नी के पल्लू पर वे ही शब्द लिखे हुए थे। उसने समस्त प्रमाण अपने माता-पिता को बताते हुए स्वप्न की बात भी बताई। इस प्रकार माता-पिता की आज्ञा से मावजी को पति रूप में प्राप्त किया। किन्तु दोनों का संसारिक मिलन नहीं हो पाया। मावजी ने उन्हें कलियुग के अंत में निष्कलंक अवतार में मेघणी के रूप में बेणेष्वर में मिलने का वचन दिया। इन मेघणी (मेदिनी) माता का मंदिर आज भी पूंजपुर में स्थित हैं। 

मावजी नित्य गौ चारण के लिये बेणेष्वर टापू पर जाते थे। लसाड़ा गांव की कुरी माँ नाम की एक पाटीदार महिला प्रति सोमवार वहां षिवलिंग का पूजन करती। एक दिन घर पर मेहमान आ जाने से उसे देर हो गयी। जब वहां पहुंची तो याद आया कि पूजन की सामग्री तो वह घर पर ही भूल आयी थी। सूर्य अस्ताचल को अग्रसर हो रहा था। चिंताग्रस्त हो गयी कि बरसों का क्रम आज टूट जाने को था। मावजी वहां गायें चरा रहे थे उसकी उदासी को समझ गये। कहा कि वह इस कदम्ब जिसकी शाखा पर वह बैठे थे उसके नीचे एक खूंटी गाड़ दे और घर जाकर पूजन सामग्री ले आये। जब तक तुम वापस नहीं आ जाओगी सूर्यास्त नहीं होगा। कूरी माँ ने वैसा ही किया। तब मावजी ने कहा कि तुम्हारी चैपाल में भैंस के खूंटे के नीचे मेरे सवा सौ रुपये गड़े हैं, दे सको तो चलूं। कूरी माँ ने कहा- यदि वो तुम्हारे हैं तो ले लेना। मावजी उसके साथ गये। इंगित स्थान पर उन्हें रुपये मिल गये, उसी धन से अहमदाबाद से 14 पोठी कागज मंगवाया जिस पर पांच बड़े-बड़े ग्रंथ चैपड़े लिखे गये।

वागड़ पर सिंधियों का आक्रमण हुआ तब पेषवा बाजीराव लूट के सामान के साथ चैपड़ा रत्न सागर भी अपने साथ ले गया। उसकी फौज ने बांसावाड़ा पहुंच कर राजतालाब के किनारे रामकुण्ड पर डेरा डाला तभी उसके रथ का पहिया टूट गया। जिसके लिये स्थानीय सुथार को बुलवाया गया। मावजी ने पहले ही स्वप्न देकर उस सुथार को (नाम पर शोध की आवष्यकता) उसे पारिश्रमिक के स्थान पर ग्रंथ मांगने को कहा था। सुथार ने स्वप्न के अनुसार ही वह ग्रंथ जिसके पन्ने इधर-उधर उड़ रहे थे मांग लिया।

शेषपुर में मावजी का अंतिम संस्कार हुआ। जनश्रुति के अनुसार निष्कलंकी मूर्ति का प्राकट्य मावजी की चिता में से हुआ। इसमें घोड़े का एक पैर जमीन से तनिक ऊँचा उठा हुआ था। मान्यता है कि जब यह पांव जमीन को छू जायेगा तब प्रलय आ जायेगा। अभी इसमें कागज निकल जाने भर का अन्तर शेष हैं।

आबुदरा, दैत्य राज बाली की यज्ञ भूमि हैं। जनश्रुति यह भी है कि उसके भीतर एक बहुत बड़ा महल है जो मावजी का निज धाम हैं। जब वे निजधाम जाते थे तो माही भी रास्ता छोड़ देती थी। कहते हैं एक बार एक षिष्य ने जिज्ञासावष उनका पीछा किया। जब मावजी को इसका अहसास हुआ तो उन्होंने उसे हौले से चपत लगाई, अगले ही पल वह अपने घर के आंगन में था।

एक बार साधुओं की एक जमात पालोदा में आयी। जब उन्होने सुना कि यहां गादी पर एक महिला विराजमान है तो वे अपनी नाराजगी व्यक्त करने हरिमंदिर पहुंचे किन्तु वहां जाकर देखते हैं कि जनकुंवरी के दाढ़ी मूंछें हैं तो वे सभी शांत होकर वापस चले गये।