पं. दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय संग्रहालय धानक्या, जयपुर

पं. दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय संग्रहालय धानक्या, जयपुर

परियोजना का नाम : पंडित दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय संग्रहालय

(बजट घोषणा-2014-15, 124.0.0)

वित्तीय स्वीकृति : 494.27 लाख एवं MPLAD/MLALAD से 200 लाख 

भौतिक प्रगति : पेनोरमा निर्माण का कार्य प्रगति पर है।

महामनीषी पं. दीनदयाल उपाध्याय के जीवन का संक्षिप्त परिचय

 

जन्म:   धन्य धरा धानक्या

महान् देशभक्त और एकात्म भारतीय चिन्तक पं. दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितम्बर 1916 को जयपुर जिले में धानक्या रेल्वे स्टेशन पर इनके नाना जी के घर पर हुआ था। इनके नाना श्री चुन्नीलाल जी शुक्ल धानक्या रेल्वे स्टेशन के तत्कालीन स्टेशन मास्टर थे।

माता-पिता:      दीनदयाल जी के पिता श्री भगवती प्रसाद जी थे तथा इनकी माताजी का नाम  श्रीमती रामप्यारी देवी था।

पैतृक गांव:     दीनदयाल जी के पिता श्री भगवती प्रसाद जी मथुरा जिले के ग्राम नगला चंद्रभान के मूल निवासी थे। नगला चंद्रभान दीनदयाल जी का पैतृक गांव था।

लालन-पालन: जब दीनदयाल जी ढाई वर्ष के थे तभी उनके पिताजी का स्वर्गवास हो गया। तत्पश्चात् जब दीनदयाल जी की उम्र साढे छः वर्ष थी तभी उनकी माताजी भी स्वर्ग सिधार गयी। दीनदयाल जी का पालन-पोषण उनके नानाजी श्री चुन्नीलाल जी शुक्ल और उनके मामाजी श्री राधारमण जी शुक्ल के यहां हुआ। दीनदयाल जी की ममतामयी मामी ने बड़े ही स्नेह के साथ दीनदयाल जी का लालन-पालन किया।

शिक्षा:   दीनदयाल जी की प्रारम्भिक शिक्षा गंगापुर सिटी, कोटा, राजगढ़, सीकर और पिलानी में हुई। इन्होंने सीकर के कल्याण हाई सैकण्डरी स्कूल से मैट्रिक परीक्षा में राजस्थान शिक्षा बोर्ड में प्रथम स्थान प्राप्त किया। उनकी इस उपलब्धि पर शिक्षा बोर्ड एवं सीकर के तत्कालीन महाराजा की ओर से इन्हें स्वर्ण पदकों से भी विभूषित किया। इन्हांेने पिलानी के बिड़ला कॉलेज से इन्टर की परीक्षा सर्वोच्च अंकों के साथ उर्तीण करके बोर्ड एवं कॉलेज से स्वर्ण पदक प्राप्त किये। इन्होंने कानपुर के सनातन धर्म कॉलेज से गणित विषय के साथ बी.ए. भी प्रथम श्रेणी से उर्त्तीण किया। इन्होंने इलाहबाद से एल.टी. किया। दीनदयाल जी अत्यन्त मेधावी छात्र रहे।

संघ में पदार्पण: कानपुर में अपने अध्ययनकाल के दौरान सन् 1937 में दीनदयाल जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े। सन् 1942 में उन्होंने संघ में प्रचारक के रूप में अपना जीवन प्रारम्भ किया। वे लखीमपुर जिले के जिला प्रचारक बने। सन् 1947 में वे उत्तरप्रदेश के सह-प्रान्त प्रचारक नियुक्त किये गये। राष्ट्र-सेवा हेतु वे आजीवन संघ से जुड़े रहे।

राष्ट्र सेवा हेतु राजनीति में पदार्पण: संघ की प्रेरणा से दीनदयाल जी ने राजनीति में प्रवेश किया और सन् 1951 में इनको भारतीय जनसंघ के अखिल भारतीय महामंत्री पद का दायित्व सौंपा गया। जनसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद जी मुखर्जी की मृत्यु के पश्चात् जनसंघ को आगे बढाने की जिम्मेदारी  दीनदयाल जी के ऊपर आ गयी। 29 दिसम्बर, 1967 को कालीकट अधिवेशन में उन्होंने जनसंघ के अखिल भारतीय अध्यक्ष का पद स्वीकार किया और जनसंघ को सम्पूर्ण भारत में राजनैतिक दल के रूप में पहचान दिलवायी।

निर्वाण:    जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में वे मात्र 43 दिन ही कार्य कर पाये और 11 फरवरी, 1968 चलती ट्रेन में उनकी हत्या कर दी गयी और एक राष्ट्रीय नेता का असामयिक अवसान हो गया।

सादगी भरी शख्सियत: पं. दीनदयाल जी विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। उनका सम्पूर्ण जीवन सादगी,  निरअहंकार एवं मिलनसारिता से परिपूर्ण था। वे एक राजनैतिक दल के प्रमुख नेता के साथ-साथ एक विचारक, प्रखर राष्ट्रभक्त, पत्रकार एवं लेखक भी थे। उन्होंने भारत के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक गौरव को उजागर करने के लिये उन्होंने ‘सम्राट चन्द्रगुप्त’ और ‘जगतगुरू शंकराचार्य’ नामक उपन्यासों की रचना की। उनके ही प्रयासों से ‘राष्ट्रधर्म’, साप्ताहिक ‘पांचजन्य’, ‘स्वदेश’ का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। दीनदयाल जी द्वारा राष्ट्र, समाज, संस्कृति, अर्थनीति, राजनीति आदि पर समय-समय पर लिख गया। लेखों का संकलन अनेक पुस्तकों में समाहित है जिनमें से ‘भारतीय अर्थनीति’, ‘राष्ट्र चिन्तन’, ‘राष्ट्र जीवन दिशा’ और ‘पॉलिटिक्ल डायरी’ उल्लेखनीय है। पंचवर्षीय योजनाओं पर गम्भीर चिन्तनयुक्त इन्होंने अंग्रेजी में एक पुस्तक लिखी जिसका नाम है-

,The Two Plans- Promises, Performance and Prospectus'

एकात्म मानववाद के प्रणेता: दीनदयाल जी ने भारतीय चिन्तन को एक-सूत्र में पिरोते हुए ‘‘एकात्म मानवदर्शन’’ का सूत्रपात किया और देश के सर्वांगीण विकास के लिये एक वैकल्पिक मार्ग सुझाया। 22-25 अप्रैल, 1965 को बम्बई में आयोजित चार दिवसीय अधिवेशन  में दिये गये अपने चार व्याख्यानों द्वारा दीनदयाल जी ने एकात्म मानवदर्शन की प्रस्तावना रखी। पण्डित जी का यह मानना था कि मनुष्यों को टुकड़ों में बांटकर नहीं अपितु उसे सम्पूर्ण मानव के रूप में देखना होगा। मनुष्य के शरीर, मन-बुद्धि एवं आत्मा का समग्र चिन्तन करना और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को एकात्मभाव से देखना तथा सभी पंचभूतों पर सामंजस्यपूर्ण भाव से विचार एवं उनके अनुरूप व्यवहार करना एकात्म मानवदर्शन की आत्मा है। व्यक्ति, समाज, सृष्टि और परमात्मा इन चारों का एकात्मक रूप ही एकात्म मानवदर्शन का मूल आधार है।

भारत के विकास की अवधारणा: दीनदयाल जी ने भारत की कृषि प्रधानता को देखते हुए कृषि एवं पशुपालन के देशज ज्ञान के आधार पर विकास की अवधारणा प्रस्तुत की। उन्होंने रसायनिक उर्वरकों के दुष्प्रभाव से 50 वर्ष पूर्व ही देश को आगाह कर दिया था। पण्डित जी ने देश में अन्न के भण्डारण की व्यवस्था पर भी पूरा जोर दिया।

राजस्थान सरकार का श्रद्धानवत प्रयास: युगदृष्टा एवं महामनीषी पं. दीनदयाल जी उपाध्याय को विनम्र श्रद्धांजलि देते हुए राजस्थान की यशस्वी मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे जी द्वारा पण्डित जी के आदर्श जीवन को सर्व-सामान्य के समक्ष प्रस्तुत करने हेतु पण्डित जी के जन्म स्थान जयपुर में धानक्या रेल्वे स्टेशन के समीप पं. दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय स्मारक बनाने की घोषणा की गयी और माननीय मुख्यमंत्री जी के करकमलों से 25 सितम्बर, 2015 को इस राष्ट्रीय स्मारक का धानक्या की पुण्य भूमि पर शिलान्यास किया गया। राजस्थान धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण द्वारा 4,500 वर्गमीटर क्षेत्र में इस स्मारक का निर्माण कराया जा रहा है जिसमें पं. दीनदयाल उपाध्याय की 15 फीट ऊंची गनमेटल की प्रतिमा भी स्थापित की जायेगी। इस स्मारक में पं. दीनदयाल उपाध्याय के जीवन के विभिन्न पहलुओं, उनके विचार, उनके दर्शन और भारतीय राजनीति में उनके योगदान को विविध तरीकों से प्रस्तुत किया जायेगा। युगदृष्टा, महामनीषी पं. दीनदयाल उपाध्याय को कोटिशः वन्दन।

वह वीर विजेता कालजयी अविराम चेतना छोड़ गया।

यश की सम्पूर्ण विरासत से भारत का नाता जोड़ गया।।

युग-युग कविता की वाणी में जिसका यश गाया जायेगा,

आने वाला इतिहास सदा उसकी महिमा दोहरायेगा।।

-कवि पं. नरेन्द्र मिश्र