वीर अमर सिंह राठौड़ पैनोरमा, नागौर

वीर अमर सिंह राठौड़ पैनोरमा, नागौर

परियोजना का नाम: वीर अमरसिंह राठौड़ पेनोरमा, नागौर 

(बजट घोषणा 2014-15 पेरा संख्या 368.3.0)

वित्तीय स्वीकृति: 105.00 लाख रूपये

भौतिक प्रगति: माननीय मुख्यमंत्री महोदया द्वारा दिनांक 10.3.2016 को इसका लोकार्पण किया जा चुका है।

वीर राव अमरसिंह राठौड़ के जीवन का संक्षिप्त विवरण

जोधपुर के महाराजा गजसिंह की रानी मनसुखदे की कोख से अमरसिंह राठौड़ का जन्म पौष शुक्ल एकादशी वि.सं. 1670 तदनुसार 12 दिसम्बर, 1613 ई. को हुआ। राजकुमार वीर अमरसिंह राठौड़ बचपन से ही अत्यन्त साहसी, स्वाभिमानी एवं शूरवीर थे। इनके पराक्रम एवं वीरता से प्रभावित होकर राजपूताना के आठ राजा-महाराजाओं ने अपनी पुत्रियों का विवाह इनके साथ किया। 

अनारां बेगम जोधपुर के राजकार्य को प्रभावित करती थी जो राजकुमार अमरसिंह राठौड़ को पसंद नहीं था। वीर अमरसिंह राठौड़ के स्वाभिमानी व्यवहार के कारण अनारां बेगम उनसे अप्रसन्न रहती थी। विदेशी तैमूर वंश के आक्रांता बाबर का चैथा वंशज शाहजहां सत्रहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में दिल्ली का बादशाह था और जोधपुर के शासक महाराजा गजसिंह थे। शाहजहां के दरबार में ईरानी मूल के सादिक खां का पुत्र सलावत खां मीर बख्शी था।

जोधपुर महाराजा गजसिंह ने ज्येष्ठ पुत्र होने के बावजूद वीर अमरसिंह को राज्य के उत्तराधिकार से वंचित करने की आज्ञा दी। शाहजहां ने महाराजा गजसिंह की मृत्यूपरांत उनकी इच्छानुसार उनके कनिष्ठ पुत्र जसवन्तसिंह का राजतिलक किया। पिता की आज्ञा का पालन करते हुए वीर अमरसिंह राठौड़ ने 13 अप्रेल, 1634 ई. को चांपावत, मेड़तिया, उदावत, कूंपावत, राठौड़, भाटी और चैहान योद्धाओं के साथ जोधपुर त्यागकर मेड़ता के लिये प्रस्थान किया। 

पराक्रमी अमरसिंह राठौड़ 1635 ई. में धामुनी दुर्ग पर आक्रमण कर बुंदेला जुंझारसिंह पर और 1637 ईं. में साहू भौंसले के विरुद्ध सैनिक अभियान में तथा सन्् 1638 में कंधार युद्ध में विजयी रहे। उन्होंने पठानकोट पर आक्रमण कर राजा जगतसिंह को परास्त किया। इनकी वीरता और पराक्रम के कारण उन्हें 1638 ईं. में राव की पदवी, 3 हजारी जात और 3000 सवारों का मनसब प्राप्त हुआ। 

शाही सेना के मनसबदार केसरीसिंह जोधा द्वारा अटक नदी के पार जाने के शाही हुक्म को मानने से इन्कार करने पर बख्शी सलावत खां ने उनकी मनसबदारी जब्त करवा दी। राव अमरसिंह राठौड़ ने केसरीसिंह जोधा को सम्मानपूर्वक तीस हजार का पट्टा व कुछ गांव जागीर में देकर नागौर की सुव्यवस्था का दायित्व सौंपा। बख्शी सलावत खां इस कारण राव अमरसिंह राठौड़ से नाराज हो गया।

राव अमरसिंह राठौड़ जब शाही दरबार में बादशाह शाहजहां से मुलाकात करने के लिये गये तो सलावत खां ने कहा कि ‘बादशाह के लिये नजराना लाये हो तो निकाल कर दंे।’ जवाब में अमरसिंह राठौड़ बोले कि ‘बादशाह मुझे पहचानते हैं।’ इस पर सलावत खां बोला कि ‘रावजी फीळचराई की रकम जमा कराओ।’ मीर बख्शी तैश में आकर बोला, ‘अपनी जगह छोड़कर गैर-हाजिरी की कतार में खड़े हो जाओ।’ सलावत ने फिर जोर से बोलते हुये हुक्म दिया ‘रावजी तुम्हारी गैर-हाजिरी के कारण तुमसे बड़ोद का परगना जब्त किया जाता है।’  फिर आक्रोषित होकर शाही बख्शी सलावत खां ने राव अमरसिंह राठौड़ को उत्तेजना में ’‘गंवार’’ कहकर अपमानित किया। स्वाभिमानी वीर अमरसिंह राठौड़ को यह अपमान सहन नहीं हुआ और उन्होंने तत्काल शाही दरबार में सलावत खां के सीने में कटार घोंपकर उसका वध कर डाला। बादशाह ने अपनी आंखों से यह दृश्य देखकर कहा कि ‘अमरसिंह तुम धाप गये हो। तुमने अपनी मर्दानी दिखा दी है। अब अपनी कटार म्यान में डाल लो’। राव अमरसिंह राठौड़ को कटार लेकर अपनी ओर बढ़ता देखकर बादशाह शाहजहां जनानाखाना में घुस गया। 

 

यह घटना देखकर दाराशिकोह से कहा कि एक हिन्दू राजा ने जो किया, यह रोम का बादशाह सुनेगा तो वह क्या कहेगा? शाही दरबार के षड़यंत्रानुसार अर्जुन गौड़ ने बादशाह से सुलह कराने के नाम पर धोखे में रखकर राव अमरसिंह राठौड़ को बादशाह से मुलाकात कराने हेतु आगरा के किले के दरवाजे में प्रवेश करते समय राव अमरसिंह राठौड़ की पीठ में तलवार घोंप दी। घायल अवस्था में भी उन्होंने अनेक शाही सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया तथा अर्जुन गौड़ का कान काट दिया और स्वयं भी वीरगति को प्राप्त हो गये।

स्वाभिमानी बल्लू चांपावत ने अद्भुत वीरता का परिचय देते हुए राव अमरसिंह राठौड़ के शव को आगरा के किले के बाहर  पहुंचा दिया। शाही सेना से मुकाबला करते हुए बल्लू चांपावत, भावसिंह कूंपावत व पं. गिरधर व्यास सहित अनेक योद्धाओं ने केसरिया कर प्राणोत्सर्ग किया।

किसी बादशाह के भरे दरबार में स्वाभिमान की रक्षा हेतु साहस व शौर्य प्रदर्शन की यह अद्वितीय घटना है। वीर योद्धा राव अमरसिंह राठौड़ को शत-शत नमन।