महाराजा सूरजमल पैनोरमा, भरतपुर

महाराजा सूरजमल पैनोरमा, भरतपुर

परियोजना का नाम: महाराजा सूरजमल पेनोरमा, भरतपुर

109.00 लाख रूपये से कार्य पूर्ण किया जा चुका है।

महाराजा सूरजमल के पुराने महल के एक भाग का जीर्णाेंद्धार, महाराजा सूरजमल के अश्वरोही धातु की प्रतिमा, महाराजा सूरजमल एवं महारानी किशोरी की संगमरमर की आदम कद प्रतिमाएं, संगमरमर एवं फाईबर की विभिन्न प्रतिमाएं एवं रिलीफ पैनल प्रदर्शित किये गये है।

पेनोरमा आमजन के दर्शनार्थ चालू है।

महाराजा सूरजमल के जीवन का संक्षिप्त परिचय

नाम:- महाराजा सूरजमल।

पिता:- महाराजा सूरजमल के पिता का नाम बदन सिंह (महेन्द्र) था, वे ब्रज के डीग राज्य के सिनसिनवार गौत्र के जाट महाराजा थे। 

माता:- महाराजा सूरजमल की माता का नाम रानी देवकी था, जो कामा (कॉमर) के अखैराम चौधरी (जाट) की पुत्री थी। 

जन्म दिनांक:- महाराजा सूरजमल का जन्म वि.सं. 1764 (13 फरवरी, सन् 1707-8 ई.) को हुआ। 

जन्म स्थान:- महाराजा सूरजमल का जन्म ननिहाल (कामा) में हुआ।

विवाह:- महाराजा सूरजमल की मृत्यु के समय आयु लगभग 55 वर्ष थी। उस समय तक उनकी 14 रानियां थी। जिनमें से ज्ञातव्य 6 रानियों के नामों की सूची निम्न हैं- 1. रानी किषोरी, जो कि होडल के काषी राम जाट (चौधरी) की पुत्री थी। 2. रानी हंसिया, जो कि सलेमपुर कलान के रतीराम जाट (चौधरी) की पुत्री थी। 3. रानी गंगा, जो कि बिछाविन्दी गांव की थी और महाराजा रणजीत सिंह की माता थीं। 4. रानी कल्याणी, जो कि गांव नहानी झांसी की थी और महाराजा नाहर सिंह की माता थीं। 5. रानी गौरी, जो कि अमहांड के गोरी राजपूत वंष की थी और जवाहर सिंह व रतन सिंह की मां थीं। 6. रानी खट्टू, जो कि महाराजा सूरजमल की प्रमुख रानी थीं।

निर्वाण:- महाराजा सूरजमल का निर्वाण नवाब नजीबुद्दौला के साथ हिंडन नदी के तट पर हुए युद्ध में वि.सं. 1820 (25 दिसम्बर, 1763 ई.) को युद्धभूमि में हुआ। शहादरा में महाराजा सूरजमल की समाधि बनी हुई है। महाराजा सूरजमल की अन्तेष्टि कृष्ण की पवित्र भूमि गोवर्धन में हुई। वहां पर बाद में कुसुम सरोवर पर छतरी बनायी गई।

चारित्रिक विषेषताएं:- पराक्रमी महाराजा सूरजमल एकमात्र जाट राजा थे, वे असाधारण व्यक्ति थे जिन्होंने हमारे इतिहास के एक स्वर्णिम पृष्ठ की रचना की। महाराजा सूरजमल पर उनकी माता देवकी के धार्मिक विचारों का प्रभाव था। वे सुपुष्ट शरीर, शारीरिक बल, राजनयिक क्षमता, निःषंक वीरता, नम्रता, मानवता, सरसता व उदारता की अद्भुत प्रतिभा थे। महाराजा सूरजमल कुषल प्रषासक, दूरदर्षी और कूटनीति के धनी सम्राट थे और वे किषोरावस्था से ही अपनी बहादुरी की वजह से ब्रज प्रदेष में सबके चहेते बन गये थे। महाराजा सूरजमल को दीवानी व फौजदारी मुल्कगिरी (दिग्विजय) तथा कूटनीति का अठारहवीं शताब्दी का महान् व्यक्ति लिखा गया हैं। महाराजा सूरजमल कला, संस्कृति व साहित्य के महान् प्रेमी थे। उनके दरबार में सूदन, सोमनाथ, अखैराज, षिवराम, कलानिधि, वृन्दावनदास, सुधाकर, हरवंष, मुहम्मद बख्श ‘आसोब’, सैय्यद नूरुद्दीन हसन आदि साहित्यकारों को राज्याश्रय प्राप्त था।

सामाजिक/ आध्यात्मिक योगदान:- भारतीय राज्यव्यवस्था में सूरजमल का योगदान सैद्धान्तिक या बौद्धिक नहीं, अपितु रचनात्मक तथा व्यवहारिक था। जाट-राष्ट्र का सृजन एवं पोषण एक आष्चर्यजनक सीमा तक इस असाधारण योग्य पुरुष का ही कार्य था। मुसलमानों, मराठों या राजपूतों से गठबन्धन का षिकार हुए बिना ही उसने अपने युग पर एक जादू-सा फेर दिया था। राजनीतिक तथा सैनिक दृष्टि से वह शायद ही कभी पथभ्रान्त हुआ हो। कई बार उसके हाथ में काम के पत्ते नहीं होते थे फिर भी गलत या कमजोर चाल नहीं चलता था। नवजात जाट राज्य की रक्षा करने के लिए उसे सुरक्षित बचाये रखने के लिए साहस तथा सूझबूझ के उत्कृष्टतम गुणों की आवष्यकता थी। उसने न केवल उन दोनों लक्ष्यों को सिद्ध कर लिया, अपितु उस चिरव्यवस्था के काल में अपने लोगों को सुव्यवस्था और जीवन तथा सम्पत्ति की सुरक्षा से सुनिष्चित तथा अति अकांक्षित वरदान देने में भी सफल रहा है। उसने जाटों को प्रतिष्ठा तथा स्वाभिमान प्रदान किया। इस पुरुष की बहुमुखी प्रतिभा तथा अतिमानवीय शक्ति ने उन पर गहरा प्रभाव डाला है। विस्मय एवं सराहना के साथ वे उसे एक के बाद एक सफलता प्राप्त करते, संग्राम छेड़ते, घेरे डालते और जीवन के संध्याकाल में पुनः संचित शक्ति एवं शान्ति के साथ उभरते देखते रहे।