श्री करणी माता पेनोरमा, देशनोक, बीकानेर

श्री करणी माता पेनोरमा, देशनोक, बीकानेर

परियोजना का नाम: श्री करणीमाता पेनोरमा, देशनोक, बीकानेर

(बजट घोषणा-2015-16, 53.2.0)

वित्तीय स्वीकृति: 388.96 लाख रूपये

भौतिक प्रगति: पेनोरमा का कार्य पूर्ण हो चुका है| शीघ्र ही पेनोरमा आमजन के  दर्शनार्थ चालू किया जावेगा।

लोकपूज्या देवी करणीमाता का संक्षिप्त परिचय

लोकपूज्या देवी करणीमाता का प्रसिद्ध मन्दिर बीकानेर से लगभग 33 कि.मी. दूर देषनोक में स्थित हैं। करणीमाता के मन्दिर के कारण यह स्थान जांगल-देष (बीकानेर और निकटवर्ती क्षेत्र) की नाक (शान) होने के कारण देषनोक कहलाया।

देवी करणीजी का जन्म फलौदी के पास सुवाप गांव में मेहा जी किनिया की पुत्री के रूप में हुआ। इनकी माता का नाम श्रीमती देवल बाई था।

श्री करणीजी जब माता के गर्भ में आईं उस समय वे अपने पिता की छठ़ी कन्या सन्तान थीं। जब श्री करणीजी के माता के गर्भ में होने का पता मेहाजी को चला तब उनको ऐसा लगा कि इस बार अवष्य ही पुत्र ही होगा। परन्तु 10 वे माह के समाप्त होने पर भी प्रसूति नहीं हुई। प्रतीक्षा करते-करते 12 वां, 15 वां माह भी निकल गया, तब एक रात को माता निद्रा में सो रही थी तो उनको स्वप्न में दिखा कि सामने एक लड़की हाथ में त्रिषूल लिए खड़ी है और माता को कह रही है कि मैं तेरे उदर से जन्म लूंगी। मैं अपनी इच्छा से 21 वें महीने के बाद गर्भ से बाहर आऊंगी।

इस प्रकार 21 महिने गर्भ में रहकर विक्रम संवत् 1444 आष्विन शुक्ल 7 शुक्रवार तदनुसार दिनांक 20 सितम्बर, 1387 को फलौदी (जोधपुर) के पास सुवाप ग्राम में चारण कुल में मेहाजी किनिया के घर श्री करणीजी का  अवतरण हुआ। कन्या का नाम रिधुबाई रखा गया। जन्म के 7 वें दिन जब सूर्यपूजन हुआ जब मेहाजी की बहिन ने दुःखी मन से नवजात कन्या के सिर पर ठोला मारा। जैसे ही ठेला मारा, उनकी अगुलियां वैसी ही वैसी मुुड़ी हुई रह गईं, जो वापिस खुल न सकीं। बुआ इस घटना से चमत्कृत हो गई और कहा कि इस कन्या को साधारण न समझें, यह संसार में अपनी कुछ करनी दिखलायेगी और तब बुआजी ने कन्या के जन्म के नाम रिधुबाई को बदलकर करणी नाम रख दिया। इस दिन से ही रिधुबाई का नाम करणी प्रसिद्ध हुआ। जब करणीजी 5 वर्ष की थी तब एक दिन बुआ उनको स्नान करा रही थी तब करणीजी ने पूछा कि आप दोनों हाथों से क्यों नहीं नहला रही हैं? तब बुआ ने जन्म के समय की सारी घटना सुनाई। फिर करणीजी ने उनका हाथ अपने हाथ में लेकर कहा कि आपका हाथ तो बिलकुल ठीक है और करणीजी के यह कहते ही बुआ का हाथ बिलकुल ठीक हो गया। बुआ ने अपने भाई व भाभी से इस चमत्कार की चर्चा की। यह देखकर पिता मेहाजी को भी आष्चर्य हुआ और विष्वास हो गया कि मेरे घर में देवी का असाधारण अवतार प्रकट हुआ है।

एक रात को करणीजी के पिता खेत से घर लौट रहे थे। चौमासे की ऋतु होने के कारण जंगल में उनके पैर पर एक सर्प ने डस लिया। मेहाजी अचेत होकर भूमि पर गिर पडे़। देर रात तक घर नहीं पंहुचने के कारण जब उनके परिवार को चिन्ता हुई तो सभी उनको लोग ढूंढ़ने निकले। देखा तो पता चला कि उनको सांप ने काटा है। लोग मेहाजी के अचेत शरीर को उठाकर घर ले आये। घर के आंगन में ही बालिका करणीजी सो रही थीं। आवाज सुनकर वह उठी और घर में मचे कोलाहल का कारण पूछा। पता चलने पर वे अपने मृत पिता की देह के पास पहुंची और जिस जगह सर्प ने डसा था वहां अपना हाथ रखकर पिताजी से कहा कि पिताजी उठिये, अपने काम पर लगिये। ऐसा कहते हैं कि यह सुनते ही मेहाजी तत्काल उठ बैठे हुए।

करणीजी के जन्म से पूर्व मेहाजी के, देवल देवी के गर्भ से पांच कन्या हो चुकीं थी। करणीजी के जन्म के चार वर्ष बाद एक और कन्या की प्राप्ति हुई। इस तरह मेहाजी के कुल सात कन्याएं हो गई जिनमे नाम क्रमषः इस प्रकार हैं:- लालबाई, फूलबाई, केसरबाई, गैंदाबाई, सिद्धिबाई, रिधूबाई, गुलाबबाई। ये सातों कन्याएं चारण जाति में शक्ति का अवतार मानी जाती है।

कन्याओं से घर भर जाने और पुत्र उत्पन्न न होने के कारण माता-पिता का चिŸा सर्वदा खिन्न रहा करता था। एक दिन संयोगवष श्री करणीजी की भुआ सुवाप आई थी तो उसने करणीजी को निवेदन किया कि बाई, तू जगत् को अपने दैवी चमत्कार दिखाया करती हैं। लोग तुमको महामाया का अवतार मानते हैं। क्यों नहीं, तू अपने पिता को पुत्र प्राप्ति का वरदान देती? श्री करणीजी ने उŸार दिया कि पिताजी को मेरी ओर से कह दो कि पुत्र के लिए चिन्तित न हों, वे एक पुत्र चाहते हैं, मैं दो पुत्र का वरदान देती हूं। बुआ ने जब यह बात मेहाजी और देवलबाई को बताई तो उनके हर्ष की सीमा नहीं रही। कुछ ही दिन बाद देवलबाई को गर्भ-प्राप्ति हुई और दसवें महीने में पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम श्री करणीजी की आज्ञानुसार ’सातल’ अर्थात् सात-बहिनों-वाला रखा गया। इसके दो वर्ष बाद उनको दूसरा पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम मेहा ने ’सारंग’ रखा। इस प्रकार श्री करणीजी के वरदान से मेहा के घर दो पुत्र जन्मे और उनकी तत्सम्बनधी सारी चिन्तायें दूर हो गई।

इसी प्रकार सुवाप गांव में ही सुवा नाम का एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण था। उसने तीन विवाह किये थे, परन्तु एक भी स्त्री से उसको पुत्र लाभ नहीं हुआ। इस कारण वह बहुत दुखी रहता था। एक दिन वह श्री करणीजी से प्रार्थना करने लगा कि मेरे तीन स्त्रियां होते हुए भी कोई सन्तान नहीं हुई हैं। वंषविच्छेद होने की चिंता सताती रहती हैं। यदि आपके वरदान से मुझको पुत्र लाभ हो जाये तो इस क्लेष से मुक्ति मिले। करणीजी ने उसे वरदान दिया कि तुझको अवष्य पुत्र लाभ होगा। वरदान से ठीक दस मास बाद सुवा के एक पुत्र हुआ, जिससे हर्षित होकर उसने श्री करणीजी की सेवा की।

करणीजी के चमत्कारांे की चर्चा पूगल के भाटी राव शेखा तक पंहुची तब उसके भी मन में उनके दर्षन करने की जिज्ञासा पैदा हुई। वह अपने सैन्यदल सहित सुवाप पंहुचा। रास्ते में करणीजी दही व बाजरे की रोटियों का, भाता (पिता के लिए भोजन) लिये मिल गईं। उसने करणीजी को प्रणाम किया। करणीजी ने कहा कि आप मेरे मेहमान हैं, भोजन करके पधारो। राव शेखा ने कहा कि हम शत्रुओं से बैर लेने जा रहे हैं। मार्ग में आप के दर्षन हो गये हैं, शुभ शकुन है, हमको जाने की आज्ञा दीजिये। करणीजी ने कहा - घर आया मेहमान भूखा नहीं जा सकता। शेखा ने कहा- बाईसा, हम लगभग डेढ़ सौ आदमी हैं। इससे हमारा पेट नहीं भरेगा। करणीजी ने कहा कि थोड़ा बहुत चखकर ही सन्तोष कर लेना। करणीजी की आज्ञानुसार सभी भोजन चखने के लिए बैठ गये। करणीजी ने उस दही और थोड़ी-सी रोटियों से सारे दल को भोजन करा दिया फिर भी दही और रोटियां कम नहीं हुए। यह देखकर शेखा करणीजी के चरणों में गिर पड़ा और कहा कि हमें आषीर्वाद दीजिए ताकि हमारी षत्रुओं पर विजय हो। करणीजी का आषीर्वाद पाकर राव शेखा युद्ध में विजय हुए। इस चामत्कारिक विजय के बाद राव षेखा को करणीजी की दैवीय षक्ति पर अटल विष्वास हो गया और वह उनका अनन्य भक्त बन गया। बाद में राव षेखा ने करणीजी को अपनी धर्मबहिन बनाया।

करणीजी की आयु बढ़ने के साथ ही मेहाजी की भी चिन्ता बढ़ती गई। पिता को चिन्तित देख करणीजी ने अपनी सहेली के द्वारा पिता को कहलाया कि मेरा विवाह जांगळू राज्य के साठीका ग्राम में केळूजी के पुत्र देपाजी के साथ सम्पन्न होगा। यह सुनकर मेहाजी ने साठीका पहुंचकर विवाह निष्चित किया। वि.सं. 1473 आषाढ़ शुक्ल नवमी को श्री देपाजी के साथ करणीजी का साधारण रीति से विवाह सम्पन्न हुआ। करणीजी को गायें बहुत प्रिय थीं अतः उन्होंने हठ करके लगभग दो सौ गायें अपने साथ ले लीं। विवाहोपरान्त वर-वधू सुवाप से 3-4 कोस ही पहुंचे थे कि देपाजी और उनके सेवकों को प्यास लगी। दूर-दूर तक कहीं पानी नजर नहीं आ रहा था। करणीजी ने रथ के अन्दर से आवाज दी कि आप पीछे मुडकर देखें। जैसे ही देपाजी ने पीछे मुड़कर देखा, स्वच्छ पानी से भरी तळाई नजर आ रही थी। देपाजी के आष्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। वे इसी रास्ते से आ रहे थे पर वहां पूर्व में तो कोई तलाई नहीं थी। देपाजी ने तलाई से पानी मंगवाने और सभी ने प्यास बुझाई। देपाजी ने करणीजी को पानी की पूछने के लिए जैसे ही रथ का परदा उठाया तो देखा कि वहां सिंह पर सवार, सूर्य का तेज धारण करने वाली रूप और सौन्दर्य की पुंजरूप श्री महाषक्ति स्वयं हाथ में त्रिषूल लिये हुए खड़ी हैं। देवी ने कहा कि आपको मैंने अपना अलौकिक और वास्तविक दोनों रूप बता दिये हैं। आप जिस रूप में चाहंे, मुझे देख सकते हैं। मैं इस संसार में सांसारिक सुख भोगने नहीं आई हूं। दीन-दुखियों का अत्याचार करने वाले, सम्पत्तियों को लूटने वाले लोग, जो अपना कर्तव्य भूल गये हैं, उनको कर्तव्य का बोध कराने, मुझे इस लोक में आना पड़ा। इतना सुनाकर करणीजी ने पुनः अपने भौतिक रूप में आकर देपाजी के हाथ से पानी पीकर देपाजी के भ्रम का निवारण किया।

देपाजी को अपना स्वरूप दिखाने के बाद जब करणीजी का रथ आगे बढ़ा तो रास्ते में कोलिया नामक मांगळिया राजपूतों का गांव आया, यहीं पर एक कुआं चल रहा था। करणीजी ने वहां के राजपूत मांगळिया को आज्ञा दी कि हम लम्बी यात्रा से आए हैं, हमारे पशु बहुत प्यासे हैं, इनको पानी पिलाओ। मांगळिया ने निवेदन किया कि बाईजी हमारे गांव में कुआं एक ही है और इसमें पानी बहुत कम है, गहरा भी बहुत है। इस पर करणीजी ने आज्ञा दी कि कल तुम हमारी एक मूर्ति बनाकर कच्चे चमड़े में रख कुएं में डुबो देना और कुए का नाम करणीसर रख देना। कुएं में अखूट पानी हो जायेगा, कभी कमी नहीं होगी तथा यहां जिस खेजड़ी की छाया में हमने विश्राम किया है, इसको कभी मत काटना। यह वृक्ष सदैव फूलता-फलता रहेगा।

वहां से रवाना होकर गोधूलि समय वे एक गांव पहंुचे। वहां का अणदा खाती जो श्री करणी के चमत्कारों के बारे में जानता था, वह इनको आग्रहपूर्वक अपने घर ले गया। देपाजी ने ठहरना उचित समझा। अणदा की मां ने करणीजी से कहा कि अणदा मेरा एक ही बेटा है जो कुएं में नीचे उतर कर उसे ठीक करने का काम करता है। आप उपकी रक्षा का आषीर्वाद दो। करणीजी ने कहा कि विपदा में हो तब मुझे याद कर लेना। इस आषीर्वाद वचन के साथ ही करणी व देपाजी ने वहां से प्रस्थान किया और साठीका आ पहुंचे। साठीका में गोधन हेतु पर्याप्त मात्रा में पेयजल उपलब्ध नहीं था। करणी जी अपनी गौओं को प्यासी नहीं देख सकती थी। अतः उन्होंने गौधन की रक्षार्थ वि.सं. 1475 जेष्ठ शुक्ल नवमी को अपने ससुर, सास, पति और कुटुम्बियों को साथ लेकर सदा के लिए साठीका का परित्याग कर दिया। 

साठीका से चलकर कर करणीजी लगभग 2-3 कोस दूरी पर ‘बंधाळा’ गांव पहंुची जहां पर मार्ग में एक नई दुल्हन को विलाप करते देखा। लोगों ने बताया कि इसका पति ससुराल से लौट रहा था। रात को सोते समय इसके पति को पीवणा सर्प ने डस लिया। जिससे इसके पति की मृत्यु हो गई। करणीजी को उस नई ब्याही हुई राजपूतानी पर तरस आ गया। उन्होंने उसके पति के पास जाकर सिर पर हाथ रखते हुए कहा कि ‘बीर, उठ खड़ा हो’ ये वचन श्रीमुख से निकलते ही मृत युवक तत्काल ही जी उठा और दोनों जोड़े सहित श्री करणीजी के पैरों में गिर पड़े। 

करणीजी आगे चलते हुए जांगलू पहुंची। यहां का शासक कान्हा था। उसको जब पता चला कि करणीजी अपनी गायों के साथ यहां आकर रह रही हैं और उनका सारा गौवंष कुए पर पानी पी रहा है तब उसने अपने सेवकों को करणीजी की गायों को भगाने का आदेष दिया। ये लोग करणीजी की गायों को भगाने लगे तब करणीजी ने क्रोध में आकर कहा कि ‘गीदड़मुंहों’ भाग जाओ। यह कहते ही इनके मुंह गीदड़ के समान हो गये और भाग गये।

प्रातः जब करणीजी पूजा-पाठ कर रही थी तब कान्हा अपने दल के साथ हाथी पर सवार हो वहां पहुंचा। उसे देखकर करणीजी बाहर आईं और कहा- बोल, क्या बोलता है? मेरी पूजा-मंजूषा (करण्ड) को गाड़ी पर रखवा दे, मैं निकल जाऊगी। कहा जाता है कि हाथी से खिंचवाने पर भी पूजा-मंजूषा टस-से-मस नहीं हुई। करणीजी ने अपने हाथ से एक रेखा खींच दी और कहा कि इसको पार करते ही तेरी मृत्यु होगी। कान्हा जैसे ही घोडे़ को ऐड मारकर रेखा पार करने लगा तभी अचानक एक सिंह ने प्रकट हो कान्हा का वध कर दिया। कान्हा के वध के बाद उसी समय करणीजी ने अपने अनन्य भक्त राव रिड़मल को जांगळू का षासक बना, राजतिलक कर दिया। 

एक बार करणीजी पूगळ गई हुई थीं। पीछे से मौके का फायदा उठाते हुए गोगोळाव के स्वामी डाकू पेथड़ और सूजासर के स्वामी सूजा मोहित देषनोक ओरण पहुंचे और करणीजी की गायों को घेर लिया। करणीजी की गायों का चरवाहा दषरथ मेघवाल उनसे जूझता हुआ काम आ गया। काळू पेथड़ ने करणीजी के प्रिय सांड को मार दिया तब लाखण की पुत्री सांपू जो उन दिनों वहां आयी हुई थी ने पुकार लगाई कि दादीसा डाकूओं ने आपकी गायों को घेर लिा है और दषरथ मेघवाल को मार डाला है। आप जल्दी आओं। सांपू की पुकार सुन करणीजी तुरन्त त्रिषूल को हाथ में लेकर आ उपस्थित हुईं। डाकू काळू पेथड़ व सूजा मोलि का त्रिषूल से वध कर गायों को डाकुओं से मुक्त कराया। करणीजी ने दषरथ मेघवाल को कोटवाल का पद देकर उसकी मूर्ति गुम्भारे के सामने स्थापित कर दी जहां करणीजी जी जोत के बाद दषरथ की जोत उतारी जाती हैं उसका स्थान मुख्य द्वार से उत्तर की ओर स्थित है।

एक दिन राव शेखा पूगल में दरबार लगाकर बैठा हुआ था। कवियों की कविताओं का आनन्द ले रहा था। इतने में आकाष से विद्युत्पात हुआ और राव षेखा के ठीक सिर पर बिजली गिरी उसी समय वह क्या देखता है कि श्री करणीजी उसके निकट खड़ी हैं और अपनी लोवड़ी की ओट में उसको लेकर बिजली के प्रकोप से बचा रही हैं। इस घटना के बाद राव शेखा ने प्रत्येक शुक्ल पक्ष की चतुर्थषी को देषनोक पंहुचकर श्री करणीजी के दर्षन करना अपना नियम बना लिया था।

चित्तौड़ के महाराजा लाखा ने नाराज होकर वहां के प्रसिद्ध सेठ झगडूषाह को अपने राज्य से निष्कासित कर दिया। झगडूषाह करणीजी से रक्षा का वचन लेकर खींवसर बस गया। उसका व्यापार समुद्री मार्गों से होता था। खींवसर को अपना निवास स्थान बनाकर उसने समुद्री द्वीपों में जहाज द्वारा अपना व्यापार करना प्रारम्भ कर दिया। जब वह टापुओं से अपना जहाज लेकर देष लौट रहा था तो उसका जहाज अचानक समुद्री चक्रवात में फंस गया। जब वह इस आपत्ति में पड़ गया तो उसने श्री करणीजी को स्मरण किया। उसने करणी-करणी की रट लगा दी। उस समय करणीजी अपनी सास के साथ गायों की दुहारी कर रही थीं। उन्होंने गाय दुहते-दुहते ही तुरन्त अपनी एक बांह पसार कर समुद्री चक्रवात में धिरे झगडूषाह की जहाज को तार कर किनारे ला दिया। तत्पष्चात् दुहारी के बाद सास ने पूछा कि बहू तुम्हारी बांह की कंचुकी (कांचळी) कैसे भीगी है? तब करणीजी ने बताया कि झगडूषाह की जहाज को तूफान से बचाया है, जिसमे मेरी बाह भीग गई है। 

जोधपुर के राव बीका अपने चाचा कांधल के साथ 100 घुड़सवार और 500 पैदल सेना लेकर नया राज्य स्थापित करने के ताने पर निकल कर करणीजी की सेवा में पहुंचा। करणीजी ने उसे राजा बनने का आषीर्वाद देते हुए बीका को राजसिंहासन पर बिठा दिया। तभी से करणीजी बीकानेर की कुलदेवी प्रतिष्ठित हुईं तथा ‘बीकानेर राज श्री करणीजी महाराज रो दियो’ कहलाया।

मंदार का स्वामी राणा मोकळ मोहिल जाति का राजपूत और करणीजी का परम भक्त था। एक बार वह अपने शत्रुओं पर आक्रमण करने के लिए रवाना हुआ। युद्ध के दौरान शत्रुओं ने उसके घोड़ों पर प्रहार किया। जिससे उसके रथ का एक घोड़ा मारा गया। ऐसे कठिन समय में उसने अपनी रक्षार्थ श्री करणीजी की पुकार की और तत्काल ही उसने देखा कि उसके रथ में सिंह जुता हुआ है। इस प्रकार एक घोड़ा और एक सिंह मिलकर शत्रुओं के सन्मुख रथ को खींचकर ले जा रहे हैं। इस घटना से मोकळ को विष्वास हो गया कि श्री करणीजी मेरे साथ हैं, जिनकी कृपा से यह दैवी सहायता पाकर मैंनें अपने शत्रुओं के साथ घोर युद्ध किया है और मैं विजयी हुआ हूं।

उसके कुछ दिन बाद ही अणदा ख्याती एक कुएं में काठ (जमोत) ठीक कर रहा था। ठीक करने के बाद वह चमड़े की चड़स पर बैठ बाहर निकल रहा था कि अचानक लाव (चमड़े का रस्सा) टूट गई।  वह कुएं के तले में गिर ही रहा था कि उसके मुंह से निकल गया, ‘हे करणी, रक्षा करें’। ठीक उसी समय एक दोमंुहा सांप वहां प्रकट हो गया और उसने लाव के टूटे दोनों छोरों को पकड़ लिया। अणदा को सकुषल बाहर निकाल लिया गया। उसके बाहर निकलते ही सांप अदृष्य हो गया। इस घटना से अणदा इतना प्रभावित हुआ कि वह सपरिवार देषनोक आकर बस गया, जहां आज तक उसके वंषज रह रहे हैं।

जब मॉ करणी ने जैसलमेर जाने का निष्चय कर लिया तब उन्होंने अपने आश्रित अनुगत सभी राव, राजा, महाराजा, अपने परिवार के लोगों और भक्तों को देषनोक बुलाया और कहा कि जब तुम्हारे उपर कोई विपत्ति आए, कष्ट पड़े तो मुझे याद करना। मैं जैसे आज तुम्हारी सहायता करती हूं, मार्ग-दर्षन करती हूं, रक्षा करती हूं, उसी प्रकार सदा करती रहूंगी। तुम लोग मेरी प्रतिमा की श्रद्धापूर्वक पूजा करना। मैं सदा अपनी मूर्ति में विद्यमान रहूंगी। यह कहकर उन्होंने जैसलमेर के लिए प्रयाण किया। उन्होंने आदेष दिया कि उसके साथ केवल उनका बड़ा पुत्र पूनराज (पुण्यराज) और उनका भक्त सारथि जांगलू निवासी बिष्नोई सारंग ही आ सकेंगे। 

जब जैसलमेर सात कोस दूर रह गया था, तब रोग से पीडि़त रावल जैतसिंह पालकी में लेट कर अपने परिवार और प्रजाजनों के साथ मॉ करणी का स्वागत करने आ पहुंचा। रावल जैतसिंह ने ज्यों ही अपनी पगड़ी महामाया के चरणों में रखते हुए दंडवत की, मॉ करणी ने अपना दाहिना हाथ रावल की रोग-ग्रसित पीठ पर रखा। उस हाथ के स्पर्ष मात्र से क्षणभर में ही वह असाध्य रोग गायब हो गया और रावलजी की काया कंचन के समान हो गई। उन्हें नव-जीवन प्राप्त हुआ। यह चमत्कार देखते ही मां करणीजी की जय-जयकार चारें दिषाओं में गूंजने लगी। लोग विस्मित हो गए। रावल जैतसी और जैसलमेर से स्वागतार्थ आए गणमान्य लोग और साधारण जनता ने मां करणीजी सहित जब जैसलमर नगर में प्रवेष किया तो गली-गली से लोग दर्षनार्थ उमड़ पड़े।

करणीजी ने जैसलमेर आगमन के दूसरे ही दिन प्रातःकाल भ्रमण करने हुए जन्मांध वृद्ध बढ़ई को अपने घर के आगे बैठे देखा। उन्होंने उसपर करुणा बरसाते हुए उसे नेत्र-ज्योति प्रदान की एवं अपनी मूर्ति बनाने का आदेष दिया। जैसलमेर से विदा होते समय माता ने बढ़ाई को आदेष दिया, ‘मेरी मूर्ति को तैयार करके देषनोक पहुंचा देना।’ जैसलमेर से विदा होकर मां करणी तेमड़ाराय गयी और वहीं अपनी आराध्या तथा जैसलमेर की कुलदेवी मॉ आवड़जी के दर्षन किए। तेमड़ाराय में स्थित खारोड़ा गांव में देवी देवल एवं बूट से मिलने गयीं।

देवल और बूट दोनों ने ही द्वार पर सामने आकर करणीजी का स्वागत किया। मां करणी बूट और देवल के साथ खारोड़े में कुछ समय ठहरीं और फिर वहां से जैसलमेर लौट आई। जैसलमेर से विदा होकर तेमड़ाराय और भादरियाराय तीर्थों की यात्रा करते हुए करणीजी बेंगटी नामक गांव पहुंची। बेंगटी गांव में वे हरबूजी सांखला से मिलीं। बेंगटी से चल कर करणीजी रामनवमी के शुभ दिन प्रभात के समय धनेरी और खारड़ी तलाइयों के बीच गडि़याला पहुंचीं। जहॉ पर वर्तमान श्री करणी परमधाम स्थल है। 

गडि़याला पहुंचकर अपने पुत्र पूनोंजी को, पास की एक तलाई धनेरी से नहाने के लिए पानी लाने का कहकर भेज दिया तथा सारंग विष्नोई को कहा कि तुम मेरे ऊपर इस झारी के पानी को उड़ेल दो। उस समय झारी में पानी की कुछ बूंदे ही थीं। आज्ञानुसार सारंग ने जैसे ही ध्यान में बैठी करणीजी पर झारी के पानी को उड़ेला तो अचानक एक ऐसी अग्नि की झळ निकली कि सूरज में जोत से जोत मिल गई। इस प्रकार वि.सं. 1595 की चैत्र सुदी नवमी गुरूवार को श्री करणीजी अन्तर्धान हुई। करणीजी अपने धारण किये गये दिव्य मानव शरीर द्वारा सषरीर ही अपने परम धाम में प्रविष्ट हुईं। तब आकाषवाणी हुई कि तुम लोग तुरन्त देषनोक जाओ, जहां पर एक अन्धे कारीगर द्वारा बनाई गई मेरी मूर्ति है जिसको वह कारीगर अपने सिर के नीचे रखे हुए मेरे गुम्भारे में सोया हुआ मिलेगा। उस मूर्ति को तुम मेरे गुम्भारे में स्थापित कर देना। श्री करणीजी की आज्ञानुसार वि.सं. 1595 की चैत्र शुक्ल चतुर्दषी को करणीजी के हाथों से बनाये हुए गुम्भारे में करणीजी की मूर्ति की स्थापना की गई।

यथासमय देपाजी के चार पुत्रों -पूनों, नगो, सिंहो और लाखण के नाम से देषनोक में चार बास बसाये गये। देपाजी के बड़े पुत्र पुण्यराज (पूनों) ने देषनोक में देपासर और करणीसर नामक कुएं खुदवाएं। 

लौकिक जीवन के समाप्ति के बाद भी करणीमाता द्वारा बीकानेर के शासकों की विपत्तिकाल में सहायता करने तथा उन्हें संकट से उबारने के अनेक प्रसंग मिलते हैं। विक्रम संवत्् 1956 में हुमांयू के भाई कामरान ने बीकानेर राज्य के दुर्ग भटनेर पर आक्र्रमण किया। बीकानेर के शासक राव जैतसी ने देषनोक पहुंचकर करणीमाता का आषीर्वाद लिया और विजय प्राप्त की। इसी तरह महाराज कर्णसिंह पर आक्रमण करने आई औरंगजेब की सेना भी करणीजी की कृपा से ही बीकानेर आकर भी बिना आक्रमण किए वापस लौट गई। देवी की इस कृपा से अनुगृहीत होकर महाराज कर्णसिंह ने अपने मनसब के स्थान -औरंगाबाद- में करणीमाता का मंदिर बनवाया। इस प्रकार करणीमाता की कृपा की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई और वे देष की महान लोकपूज्य देवी के रूप में प्रतिष्ठित हुई।

 

देषनोक में करणीमाता का वर्तमान मन्दिर उसी गुम्बारे का विस्तृत रूप है जिसे स्वयं करणीमाता ने अपने निर्देषानुसार बनवाया था।  करणी माता मंदिर का निर्माण अनेक राजाओं के शासनकाल में तथा विभिन्न चरणों में हुआ है। महाराजा सूरतसिंह ने मंदिर का परकोटा और भव्य प्रवेषद्वार बनवाया तथा  महाराजा गंगासिंह ने इसे उत्कृष्ट कलात्मक स्वरूप प्रदान किया। करणीमाता के मन्दिर की सबसे अनूठी विषेषता यहां समूचे मन्दिर प्रागंण में हजारों की संख्या में निर्भय होकर स्वच्छंद विचरण करने वाले चूहे हैं। ये चूहे करणी जी के काबा कहलाते हैं। इनको मारना व पकड़ना सर्वथा वर्जित है। इनमें से सफेद चूहों का दर्षन होना अत्यंत शुभ माना जाता है।