गुरु जम्भेश्वर पेनोरमा, पीपासर, नागौर

गुरु जम्भेश्वर पेनोरमा, पीपासर, नागौर

परियोजना का नाम: गुरू जम्भेश्वर पेनोरमा, पीपासर 

(बजट घोषणा 2014-15 पेरा संख्या 368.1.0)

वित्तीय स्वीकृति:  100.00 लाख रूपये

भौतिक प्रगति: पेनोरमा का कार्य पूर्ण हो चुका है| शीघ्र ही पेनोरमा आमजन के  दर्शनार्थ चालू किया जावेगा।

गुरु जम्भेश्वर जी के जीवन का संक्षिप्त परिचय

नाम:- लोकपूज्य गुरु जाम्भोजी गुरु जम्भेष्वर जी के नाम से भी विख्यात हैं।

पिता:- जाम्भोजी के पिता का नाम श्री लोहटजी पंवार था। लोहटजी रोलोजी के पुत्र थे एवं गांव के सम्पन्न और प्रतिष्ठित कृषक थे। 

माता:- जाम्भोजी की माता का नाम हांसा देवी था। हांसा देवी छापर गांव के निवासी मोहकमसिंह जी भाटी की पुत्री थी। 

जन्म दिनांक:- जाम्भोजी का जन्म भाद्रपद बदी अष्टमी, वि.सं. 1508 (सन् 1451 ई.) को हुआ। 

जन्म स्थान:- जाम्भोजी का जन्म नागौर जिले के पीपासर ग्राम मंे हुआ। 

विवाह:- जाम्भोजी बाल्यवस्था  से ही आध्यात्मिक प्रवृत्ति की ओर मुड़ गये और  उन्होंने आजीवन विवाह न करने का निर्णय किया।

निर्वाण:- जाम्भोजी का निर्वाण मार्गशीर्ष बदी नवमी वि.सं. 1593 (सन् 1536 ई.) को लालासर में हुआ।

निर्वाण स्थल:- जाम्भोजी के परलोकगमन करने के बाद उनके पार्थिव शरीर को उनके षिष्य लालासर से तालवा गांव ले आये और एकादषी के दिन उनके शरीर को समाधिस्थ कर दिया। वर्तमान में यह निर्वाणस्थल मुकाम गांव के नाम से प्रसिद्ध है। 

चारित्रिक विषेषताएं:- जाम्भोजी एक महान् संत एवं आध्यात्मिक विभूति थे। वे संत होने के साथ-साथ समाज सुधारक भी थे। उन्होंने तात्कालीन समय में  व्याप्त कुरीतियों और आडम्बरों के विरुद्ध आवाज उठाई। पर्यावरण संरक्षण के प्रणेता गुरु जाम्भोजी ने वन्यजीवों पर दया करने और हरे वृृक्षों की कटाई नहीं करने का मूलमंत्र दिया। गुरु जाम्भोजी अहिंसा के प्रबल समर्थक थे । उन्हांेने विष्नोई पंथ की स्थापना कर उनतीस नियमों की आचार संहिता प्रवर्तित की। यह नियमावली आज भी सदाचार, जीव दया और पर्यावरण संरक्षण के लिए तत्पर रहने की प्रेरणा देती है। 

सामाजिक/साहित्यिक/आध्यात्मिक योगदान:- जाम्भोजी ने अपनी सारी पैतृक सम्पति गरीबों को बांटकर पीपासर के निकट सम्भराथल नामक स्थान पर रहते हुए ईष्वर भजन, सत्संग तथा हरिचर्चा प्रारंभ की। यहां इन्होंने कार्तिक बदी अष्टमी विक्रम संवत् 1542    (1482 ई.) को कलष स्थापन कर विष्नोई पंथ का प्रवर्तन किया और उनतीस नियमों की आचार संहिता बनाई। सबसे पहले गुरु जाम्भोजी के चाचा पूल्होजी ने बिष्नोई पंथ स्वीकार किया था उसके बाद बिना किसी भेदभाव के जाट, राजपूत, ब्राह्मण, वैष्य, आदि अनेक जातियों के लोग पाहल ग्रहण करके बिष्नोई पंथ में शामिल हो गये। जाम्भापुराण के अनुसार विष्नोई पंथ का उद्गम सतयुग में हुआ। इस पंथ के आदि गुरु महान् भक्त प्रहलाद थे। त्रेतायुग में सत्यवादी हरिष्चन्द्र और द्वापरयुग में धर्मराज युधिष्ठिर से इस पंथ का सम्बन्ध रहा। कलियुग में गुरु जाम्भोजी ने इस पंथ का पुनः प्रवर्तन किया। गुरु जाम्भोजी के ’सबदों’-उपदेषों के संग्रह का नाम सबदवाणी है। सबदवाणी को ‘जम्भवाणी’ या ’सबद श्री वायक’ भी कहते हैं। इसमें 123 सबद एवं कुछ मंत्र हैं। जाम्भोजी का कहना है, ‘‘केवल किसी उत्तम कुल का होने से ही कोई उत्तम नहीं कहला सकता। उत्तम कर्म करने वाला व्यक्ति ही उत्तम हो सकता है।’’ गुरु जाम्भोजी के उपदेषों से प्रभावित होकर मल्लूखां ने गो-हत्या बंद करवा दी और स्वयं ने भी मांस खाना छोड़ दिया था। कर्नाटक के नवाब शेख सद्दो को भी उपदेष देकर जाम्भोजी ने गो-हत्या बंद करवाई। गुरु जाम्भोजी के दिखाये मार्ग पर चलते हुए भादों सुदी दषमी, मंगलवार वि. सं. 1787 (सन् 1730 ई.) को जोधपुर जिले के खेजड़ली गांव में विष्नोइयों के चैरासी गांवों के अनेक स्त्री-पुरुषों ने वृक्षों की कटाई रोकने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिये थे। गुरु जाम्भोजी की प्रेरणा से आज भी विष्नोई पंथ के लोग प्राणपण से वृक्षों और जीवों की रक्षा में तत्पर रहते है।  

 

 

गुरु जाम्भोजी द्वारा बताये गये उनतीस नियम:-

1. प्रसूता स्त्री तीस दिन तक घर का कोई भी कार्य नही करे।

2. रजस्वला स्त्री पाँच दिन तक गृहकार्य से पृथक् रहे।

3. प्रातःकाल स्नान करें।

4. शीलव्रत ( मर्यादा ) का पालन करें।

5. संतोष धारण करें।

6. बाहरी एवं आंतरिक पवित्रता रखें।

7. प्रातःकाल एवं सायंकाल संध्या-वंदना करें।

8. संध्या काल में आरती एवं हरिगुण-गान करें।

9. सर्वहित के लिए प्रेम पूर्वक हवन करें।

10. पानी, ईंधन एवं दूध को छानकर काम में लेवें। 

11. वाणी को बुद्धि से विचार करके बोलें।

12. क्षमा-दया धारण करें।

13. चोरी नहीं करें।

14. निंदा न करें।

15. झूठ न बोलें।

16. व्यर्थ विवाद न करें।

17. अमावस्या का व्रत रखें।

18. विष्णु का भजन करें।

19. जीव मात्र पर दया भाव रखें।

20. हरे वृक्ष न काटें।

21. काम, क्रोध, लोभ, मोह, अंहकार आदि को अपने वष में रखें।

22. रसोई अपने हाथों से बनायंे।

23. थाट अमर रखें।

24. बैल को बधिया ( नपुंसक ) न करवायें।

25. अफीम न खायें।

26. भांग न पीवें।

27. तम्बाकू का सेवन न करें।

28. मांस-मदिरा का सेवन न करें।

29. नीले वस्त्र का प्रयोग न करें।

जीवन की प्रमुख चमत्कारी/प्रेरणादायी घटनाएं:- जाम्भोजी के अलौकित चमत्कारों एवं प्रेरणादायी उपदेषों की कीर्ति उनकी बाल्यावस्था से ही चारों ओर फैल गई थी। इनके प्रमुख चमत्कारों की घटनाएं निम्नानुसार है:- 

1. 108 दीपक पानी से जलाना:- जाम्भोजी बचपन में प्रायः मौन रहते थे। इससे चिन्तित लोहटजी ने एक ब्राह्मण तांत्रिक को उपचार हेतु बुलवाया। ब्राह्मण ने पूजा की सामग्री के साथ 108 दीपक घी के भरकर रखवाये। जब तांत्रिक दीपक जलाने लगा तो दीपक नहीं जले। यह देख जाम्भोजी उठे, कच्चे सूत का धागा बांधकर कुए में से पानी निकाला और सभी दीपकों में डालकर हाथ से इषारा किया। सभी दीपक एक साथ प्रज्ज्वलित हो गये। ऐसा दृृष्य देखकर तांत्रिक सहित उपस्थित सभी लोग स्तब्ध रह गये।

2. बिना बादल के बरसात आना:- बालक जाम्भोजी ने एक दिन अपने चमत्कार से बिना बादल छाए ही वर्षा करवा दी। वे कलष के उपर एक चादर को फैलाकर खडे़ हो गए इतने में आकाष में बादल मंडरा उठे और वर्षा होने लगी। चादर पर पानी पड़ने लगा। कलष जल से भर गया। सभी लोग यह देखकर चमत्कृत हो उठे।

3. कुंवर ऊदा व बीदा को उपदेष:-जाम्भोजी ग्वाल-बालों के साथ समराथल पर बैठे थे। राव जोधाजी का पुत्र बीदाजी तथा कान्हाजी का पुत्र ऊदोजी डाकुओं का पीछा कर रहे थे। बालक जाम्भोजी के प्रताप से वे डाकू ऊंट-ऊंटनियों के टोले को छोड़कर भाग गये। पीछे से आये राजकुमारों ने ग्वाल-बालों से पूछा तो पता लगा कि चमत्कारी बालक जाम्भो जी ने इन पशुओं को डाकुओं से मुक्त कराया है। राजकुमारों ने अत्यन्त आदर भाव से जाम्भो जी के दर्षन किए और उनका उपदेष ग्रहण किया।

4. नागौर के पठान के हाथी को भेड़ में बदलना:- नागौर का सूबेदार मोहम्मद खां पठान जाम्भोजी की परीक्षा लेने हाथी पर सवार होकर समराथल पहुंचा। उसे अपनी सेना, सेवक, हाथी-घोड़ा आदि का बहुत अभिमान था। जनश्रुति के अनुसार जाम्भोजी ने उसके हाथी को भेड़ बना दिया। यह देख उसका अभिमान चूर हो गया और वह जाम्भोजी का षिष्य बन गया। उसने भविष्य में जीव हिंसा और गौ हत्या नहीं करने का संकल्प लिया।

5. षेखसद््दो से गोवध रूकवाना:- भारत भ्रमण करते हुए जाम्भोजी ने एक बार कर्नाटक का नबाव शेख सद्दो को चमत्कार दिखाया। जाम्भोजी ने उस नबाव को गाय की हत्या करने से रोका। जब शेख सद्दो ने बात नहीं सुनी तो जाम्भोजी ने उस गाय का शरीर वज्र का बना दिया। सारे उपाय करने के बाद भी वह गाय नहीं कटी तो शेख सद्दो जाम्भोजी के चरणों में गिर पड़ा और उनका षिष्य बन गया।

6. रोटू में चरण चिन्ह उत्कीर्ण करना:- धर्म बहिन उमाबाई का भात भरने के लिए जाम्भोजी रोटू गांव गये और वहां उमाबाई के घर के ठीक सामने रथ से नीचे उतरे। उन्होंने ज्यों ही अपना एक चरण धरती पर पड़ी हुई एक पत्थर की षिला पर रखा तो वह पत्थर पिघल गया। पिघले हुए पत्थर पर भगवान का चरणचिन्ह उत्कीर्ण हो गया। वह चरणचिन्ह भक्तों के दर्षनार्थ आज भी मौजूद हैं।

7. एक साथ खेजड़ियां लगाना:- भगवान जाम्भोजी उमाबाई भादू का भात भरने रोटू पहुंचे तो जोधपुर नरेष राव मालदे ने प्रार्थना की कि हे देवजी ! रोटू की सीमा में पेड़ भी नहीं है। छाया पानी की व्यवस्था अत्यंत जरूरी है। इसका कोई उपाय करो। तब जाम्भोजी ने कहा कि चिंता मत करो रात्रि के अन्तिम प्रहर मंे गोलोक से तुलसा का अवतरण होगा जो हमेषा के लिए रोटू गांव में छाया करेगी। अगले दिन लोगों ने देखा कि रोटू गांव की सीमा में एक ही ऊंचाई और आकार-प्रकार के 3700 खेजड़ियों के वृृक्ष लग गए।

8. राणा सांगा एवं झाली राणी:- एक बार पूर्व के कुछ बिष्नोई व्यापारी चित्तौड़ पहुंचे। राज्य द्वारा कर मांगने पर व्यापारियों ने राणा सांगा एवं झाली रानी को गुरु जाम्भोजी के बारे में बताया। झाली रानी ने कहा कि वे सम्भराथळ जाकर गुरु जाम्भोजी से कर देने के बारे में पूछ आये। गुरु जाम्भोजी जो भी आदेष देंगे, वह हमें स्वीकार है। बिष्नोइयों ने सम्भराथळ जाकर गुरु जाम्भोजी को सारी घटना सुनाई। तब गुरु जाम्भोजी ने भेंटस्वरूप राणी के लिए झारी, कंघी, माला, कलष एवं उपदेष के रूप में एक सबद कहा और साथ ही कर माफ करने के लिए कहा।इन वस्तुओं को देखकर राणी नतमस्तक हो गई और राणा सांगा ने बिष्नोइयों का चुंगी कर सदैव के लिए माफ कर दिया।

गुरु जाम्भोजी के इन चमत्कारों की कीर्ति चारों ओर फैल गई। इससे प्रभावित होकर आस-पास के ही नहीं अपितु दूर-दूर के लोग भी जाम्भोजी के भक्त हो गये और कालान्तर में पाहल ग्रहण कर विष्नोई पंथ में दीक्षित हुए।